अभिषेक बनर्जी को बंगाल की जनता ने मारा तो कपिल सिब्बल को होने लगे दर्द, कहा देश में नहीं रहा

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Kapil Sibal

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देश की राजनीति में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के बयानों और उनके पीछे छिपी मंशा को लेकर अक्सर बहस छिड़ती है, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की एक टिप्पणी ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद अभिषेक बनर्जी पर हुए कथित हमले की निंदा करते हुए कपिल सिब्बल ने एक ऐसा बयान दिया, जिसे लेकर देश के लोकतांत्रिक और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। सिब्बल ने कहा कि इस तरह की घटनाओं के बाद अब उन्हें भारत में रहने पर शर्म महसूस हो रही है।

सिब्बल के बयान पर उठते गंभीर सवाल

एक ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व से, जो देश के सर्वोच्च न्यायालय में वकालत करते हैं, देश के संसाधनों और संवैधानिक पदों का उपभोग करते हैं और संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) में नीति-निर्धारण का हिस्सा हैं, इस प्रकार की टिप्पणी आना आत्मचिंतन का विषय है। किसी जनप्रतिनिधि पर हमले की निंदा करना पूरी तरह न्यायसंगत है, लेकिन एक घटना को आधार बनाकर संपूर्ण राष्ट्र और उसकी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर देना और “शर्म” जैसे शब्दों का प्रयोग करना केवल एक विशेष राजनीतिक नैरेटिव को गढ़ने का प्रयास प्रतीत होता है।

कपिल सिब्बल के इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में उनकी ‘चुनिंदा संवेदनशीलता’ (Selective Outrage) को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचक पूछ रहे हैं कि अतीत में जब पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ीं, तब देश के इस शीर्ष वकील की अंतरात्मा क्यों खामोश थी?

  • चुनावी हिंसा पर खामोशी: वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद हुए पंचायत चुनावों के दौरान बंगाल में भीषण राजनीतिक हिंसा देखने को मिली। विपक्षी कार्यकर्ताओं की हत्याएं की गईं, उनके घर जलाए गए और मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ। उस वक्त कानून और संविधान की दुहाई देने वाले ये मंच मौन क्यों थे?
  • शीर्ष नेताओं के काफिले पर हमले: जब देश के तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह के हेलिकॉप्टर को उतरने की अनुमति नहीं दी गई, या जब जेपी नड्डा और कैलाश विजयवर्गीय जैसे राष्ट्रीय नेताओं के काफिले पर पथराव हुआ, तब संवैधानिक गरिमा को ठेस क्यों नहीं पहुँची?
  • संदेशखाली और महिला सुरक्षा: संदेशखाली में महिलाओं के साथ हुए अमानवीय व्यवहार और टीएमसी कार्यकर्ताओं पर लगे गंभीर आरोपों के समय भी इस तरह की तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को नहीं मिली थीं।
  • हालिया घटनाएं: वर्ष 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान भी भाजपा विधायक अग्निमित्र पॉल और मालदा के सांसद पर हुए हमलों के समय कानून-व्यवस्था की ऐसी दुहाई नहीं दी गई थी।

भाजपा का पलटवार: दिलीप घोष का तीखा निमंत्रण

कपिल सिब्बल के इस बयान पर पश्चिम बंगाल भाजपा के वरिष्ठ नेता दिलीप घोष ने भी बेहद कड़ा और सीधा पलटवार किया है। उन्होंने सिब्बल को सीधे बंगाल आने का निमंत्रण देते हुए कहा कि एसी कमरों में बैठकर और जमीनी हकीकत से दूर रहकर ज्ञान देना बेहद आसान होता है। दिलीप घोष ने कहा कि सिब्बल को एक बार बंगाल की जमीन पर आकर देखना चाहिए कि वहाँ आम नागरिकों और विपक्षी दलों की दशा क्या बना दी गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेताओं का यह दृष्टिकोण उनकी वैचारिक वफादारी को दर्शाता है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के प्रति अपनी निष्ठा साबित करने की होड़ में नेता अक्सर यह भूल जाते हैं कि देश की छवि को वैश्विक पटल पर धूमिल करने वाले बयानों के क्या परिणाम हो सकते हैं। सड़कों पर हो रही वास्तविक हिंसा से दूरी बनाकर केवल चुनिंदा घटनाओं पर छाती पीटना स्वस्थ लोकतंत्र की परंपरा नहीं है। इस प्रकार की ‘शब्दों की बाजीगरी’ से जनता को अधिक समय तक भ्रमित नहीं किया जा सकता।

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