राज्यसभा चुनाव: नंबर गेम में उलझी कांग्रेस, दांव पर खरगे की कुर्सी और BJP का ‘मिशन मोड’
Rajyasabha Election: देश में एक बार फिर राज्यसभा चुनावों की रणभेरी बज चुकी है, और इसी के साथ सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इस बार का चुनाव सिर्फ संसद के ऊपरी सदन की सीटें भरने का जरिया नहीं है, बल्कि यह देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों- बीजेपी और कांग्रेस के बीच वर्चस्व की एक जंग बन चुका है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने फुल-टाइम ‘मिशन मोड’ में नजर आ रही है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के खेमे में गहरी मायूसी और भारी तनाव का माहौल है।
अमित शाह की चुनावी चौपड़ और माइक्रो-मैनेजमेंट की चालें इस वक्त राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुकी हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि खुद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की साख और कुर्सी पर भी तलवार लटकती दिखाई दे रही है। राज्यसभा की इस बिसात पर बीजेपी का गणित क्या है और कांग्रेस के डिप्रेशन की असली वजह क्या है, विस्तार से समझते हैं।
बुद्धिजीवियों के सदन में ‘नंबर गेम’
लोकतंत्र में संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा को बुद्धिजीवियों का सदन कहा जाता है। लेकिन आज इस सदन की खाली सीटों को भरने के लिए जो खेल चल रहा है, उसे देखकर साफ है कि यहां ‘नंबर गेम’ और सियासी बाहुबल की बिसात बिछी हुई है। बीजेपी इस बार ज्यादा से ज्यादा सांसद अपने पाले से राज्यसभा भेजना चाहती है, ताकि संसद के दोनों सदनों में उसका पूर्ण नियंत्रण हो सके।
वहीं, कांग्रेस में इस वक्त गहरे अविश्वास का माहौल है। हैरानी की बात यह है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी को अपने ही विधायकों पर भरोसा नहीं है। उन्हें डर है कि कब किसका पासा पलट जाए और कब उनके अपने लोग ही उनके खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर दें। यह सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि सत्ता का वह गंदा खेल बन चुका है जहां हर एक विधायक की निष्ठा दांव पर लगी है।
बीजेपी का माइक्रो-मैनेजमेंट
बीजेपी की चुनावी मशीनरी सिर्फ पारंपरिक वोट बैंक पर भरोसा करके नहीं बैठती, उसकी असली ताकत है ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’। एक-एक सीट, एक-एक राज्य और वहां का एक-एक समीकरण पार्टी का शीर्ष नेतृत्व हर चीज पर बारीक नजर रखता है। बीजेपी अच्छे से जानती है कि लोकसभा में प्रचंड बहुमत होना एक बात है, लेकिन राज्यसभा में विधेयकों को बिना किसी रुकावट के पास कराने के लिए ‘नंबर गेम का किंग’ बनना कितना जरूरी है।
यही वजह है कि इस बार बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत इस नंबर गेम को अपने पक्ष में करने में झोंक दी है। रणनीति बिल्कुल साफ है जहां जीत पक्की है, वहां तो ध्यान है ही, लेकिन जहां मुकाबला कड़ा है, वहां विपक्ष के खेमे में ऐसी सेंधमारी की जाए कि सामने वाला संभल भी न पाए। राजनीति में इसे ही ‘साम-दाम-दंड-भेद’ कहा जाता है। बीजेपी का फोकस इस वक्त उन निर्दलीय और छोटे दलों के विधायकों पर है, जो ऐन वक्त पर पासा पलट सकते हैं। बीजेपी ने एक ऐसी चौपड़ बिछाई है, जिसमें विपक्षी दल सिर्फ मोहरे बनकर रह गए हैं।
रिसॉर्ट पॉलिटिक्स और क्रॉस वोटिंग का डर
अब सवाल यह उठता है कि आखिर कांग्रेस इतनी टेंशन में क्यों है? इसका जवाब है पार्टी के भीतर का भारी अंतर्विरोध और असुरक्षा। इतिहास गवाह है कि जब-जब राज्यसभा के ऐसे चुनाव आते हैं, कांग्रेस को अपने विधायकों को टूट से बचाने के लिए होटलों और रिसॉर्ट्स में छिपाना पड़ता है। कांग्रेस में तनाव की सबसे बड़ी वजह है ‘क्रॉस वोटिंग’ का डर। जब अपनी ही पार्टी के भीतर असंतोष चरम पर हो और विधायकों को लगे कि उनका राजनीतिक भविष्य दांव पर है, तो वे पार्टी लाइन से हटकर दूसरी तरफ वोट करने में एक सेकंड का भी वक्त नहीं लगाते।
मल्लिकार्जुन खरगे की प्रतिष्ठा दांव पर
इस राज्यसभा चुनाव में सबकी नजरें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पर टिकी होंगी। कांग्रेस को उम्मीद है कि वह कर्नाटक में तीन सीटें जीतेगी, जहां उसका नंबर गेम मजबूत दिखाई दे रहा है। इन्हीं में से एक सीट मल्लिकार्जुन खरगे की भी है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अगर कांग्रेस यहां अपना गणित नहीं संभाल पाई और खरगे अपनी सीट हार गए, तो उन्हें राज्यसभा में नेता विपक्ष (LoP) का पद भी छोड़ना पड़ सकता है।
कांग्रेस आलाकमान को इस बात का खौफ सता रहा है कि अगर इस चुनाव में उनके हाथ से सीटें निकलीं, तो न सिर्फ राज्यसभा में उनकी ताकत कमजोर होगी, बल्कि राज्यों की सरकारों और उनके संगठन की साख पर भी ऐसा बट्टा लगेगा जिससे उबरना नामुमकिन होगा।
कागजों का नंबर बनाम जमीन की हकीकत
राज्यसभा का चुनाव गणित का वह खेल है जहां जरा सी चूक हुई और पूरी की पूरी सीट हाथ से साफ। हर राज्य में जीत के लिए एक निश्चित कोटे की जरूरत होती है और ‘फर्स्ट प्रेफरेंस वोट’ (First Preference Vote) किसे मिलेगा, इस पर पूरी बाजी टिकी होती है। कई राज्यों में मुकाबला इतना करीबी है कि एक या दो वोटों का इधर-उधर होना पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल सकता है।
बीजेपी इसी ‘मार्जिन’ पर खेल रही है। वह जानती है कि विपक्ष के पास नंबर तो हैं, लेकिन वे नंबर सिर्फ कागजों पर हैं। जमीन पर, रिसॉर्ट्स के बंद कमरों में और विधायकों के दिलों में क्या चल रहा है, यह कोई नहीं जानता। उत्तर प्रदेश से लेकर हिमाचल और कर्नाटक तक, देश पहले भी ऐसे खेल देख चुका है जहाँ सत्ता पक्ष ने विपक्ष के पूरे गणित को ध्वस्त कर दिया। इस बार भी बैकग्राउंड वही है, बस किरदार नए हैं।
फुल-टाइम पॉलिटिक्स बनाम पार्ट-टाइम अप्रोच
यह राज्यसभा चुनाव देश की राजनीति की एक कड़वी सच्चाई को बयां कर रहा है। अगर आज के दौर में लोकतंत्र में सर्वाइव करना है, तो आपको ‘फुल-टाइम पॉलिटिक्स’ में इन्वॉल्व रहना पड़ेगा। बीजेपी का पूरा संगठन चुनाव की तारीख आने से बहुत पहले ही जीत की पूरी रणनीति और चक्रव्यूह तैयार कर लेता है, वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां इलेक्शन डेट अनाउंस होने के बाद भी अपने उम्मीदवार तक डिसाइड नहीं कर पातीं।
इस वक्त राज्यसभा चुनाव में जहाँ बीजेपी अपने सारे ‘एरर चेक’ कर रही है और हर कमजोरी को दूर कर रही है, वहीं कांग्रेस पार्टी अपने वजूद को बचाने और अपने ही लोगों को एकजुट रखने के लिए संघर्ष कर रही है। अब इस अग्निपरीक्षा में कांग्रेस कितनी कामयाब हो पाती है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
