सोनम वांगचुक के नाम पर आंदोलन या राजनीति? जंतर-मंतर के प्रदर्शन के बीच उठे कई सवाल

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जंतर-मंतर के प्रदर्शन को लेकर दिल्ली की सियासत लगातार गर्म है। एक तरफ़ प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की खबरें सामने आ रही हैं। कई मीडिया रिपोर्ट्स में पुलिस पर पथराव, इंटरनेट सेवाओं पर रोक और संसद मार्च की कोशिश का ज़िक्र किया गया है। इसी बीच CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने जे.पी. नड्डा से मुलाकात की बात कही, जबकि अभिजीत दिपके ने अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर दी।

लेकिन इस पूरे विवाद के बीच एक नाम सबसे ज़्यादा चर्चा में रहा—सोनम वांगचुक।

कई लोग सोशल मीडिया पर दावा कर रहे हैं कि सोनम वांगचुक को जानबूझकर “एंटी-नेशनल” बताया जा रहा है, जबकि उनके समर्थक उन्हें लोकतांत्रिक आंदोलन का चेहरा बता रहे हैं। दूसरी तरफ़ उनके आलोचक उनके पुराने बयानों और गतिविधियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यानी बहस अब सिर्फ़ आंदोलन की नहीं, बल्कि सोनम वांगचुक की राजनीतिक भूमिका पर भी पहुँच गई है।

अगर हाल की घटनाओं की बात करें, तो सोनम वांगचुक कई दिनों तक जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर रहे। बाद में स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली पुलिस ने अदालत के निर्देशों और मेडिकल सलाह का हवाला देते हुए सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया। वहीं CJP का आरोप था कि उन्हें जबरन हटाया गया।

सोनम वांगचुक के अस्पताल ले जाए जाने के बाद CJP संस्थापक अभिजीत दिपके ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू करने का ऐलान किया था। हालांकि बाद में उन्होंने सोनम वांगचुक की अपील पर अपनी भूख हड़ताल समाप्त कर दी। आंदोलन जारी रखने की बात संगठन की ओर से कही गई।

इसी बीच सोशल मीडिया पर सोनम वांगचुक के पुराने बयानों, विदेशी दौरों और विभिन्न अभियानों को लेकर भी कई दावे वायरल होने लगे। उनके आलोचकों ने FCRA, विदेश यात्राओं और कुछ सार्वजनिक टिप्पणियों का हवाला देते हुए उन पर सवाल उठाए। वहीं उनके समर्थकों का कहना है कि इन आरोपों को राजनीतिक उद्देश्य से उछाला जा रहा है। इन दावों पर अलग-अलग पक्षों की अपनी-अपनी व्याख्या है और कई आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सोनम वांगचुक केवल एक सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका निभा रहे हैं, या फिर उनका आंदोलन पूरी तरह राजनीतिक स्वरूप ले चुका है? इस मुद्दे पर भी मतभेद साफ़ दिखाई दे रहे हैं।

उधर जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन ने भी नया मोड़ ले लिया है। संसद मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प की खबरें सामने आईं। कई इलाकों में सुरक्षा कड़ी की गई और एहतियातन इंटरनेट सेवाओं पर भी रोक लगाई गई। सरकार और पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम उठाए गए, जबकि प्रदर्शनकारी इसे दमनात्मक कार्रवाई बता रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है…

क्या यह आंदोलन केवल शिक्षा और युवाओं के मुद्दों तक सीमित रहेगा, या फिर आने वाले दिनों में पूरी तरह राजनीतिक संघर्ष का रूप ले लेगा? क्या सोनम वांगचुक और CJP की रणनीति आगे भी यही रहेगी? और क्या सरकार तथा प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत से कोई समाधान निकल पाएगा?

फिलहाल इतना तय है कि जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह आंदोलन अब सिर्फ़ एक धरना नहीं रह गया है। यह देश की राजनीति, छात्र आंदोलनों और सार्वजनिक विमर्श का बड़ा मुद्दा बन चुका है।

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