पाकिस्तान ने दिखाई अपनी औक़ात, फारूकाबाद में 125 साल पुराने ऐतिहासिक गुरुद्वारे पर प्रहार

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कहते हैं कि दोगलेपन और ढोंग की अगर कोई यूनिवर्सिटी होती, तो हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान उसमें निश्चित रूप से पीएचडी (PhD) की मानद उपाधि पा चुका होता। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी वैश्विक छवि को चमकाने के लिए इस्लामाबाद पुराने हिंदू और सिख विरासत से जुड़े ऐतिहासिक स्थानों के नाम बहाल करने की बड़ी-बड़ी बातें करता है, लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि वहां अल्पसंख्यकों की धार्मिक धरोहरों की सुरक्षा को लेकर लगातार गंभीर और डरावने सवाल उठ रहे हैं।

ऐतिहासिक धरोहर पर बुलडोजर: फारूकाबाद में गुरुद्वारा क्षतिग्रस्त

ताजा और झकझोर देने वाला मामला पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के फारूकाबाद से सामने आया है। यहां स्थित करीब 125 साल पुराने ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा साहिब के एक महत्वपूर्ण हिस्से को कथित तौर पर ध्वस्त कर दिया गया है। यह गुरुद्वारा केवल ईंट-गारे की कोई मामूली इमारत नहीं है, बल्कि यह सिख समुदाय के गौरवशाली इतिहास और ऐतिहासिक सिंह सभा आंदोलन का एक बेहद महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र माना जाता है। इस ऐतिहासिक स्थल को नुकसान पहुंचाए जाने की खबर जैसे ही बाहर आई, भारत सहित पूरी दुनिया में फैले सिख संगठनों में गहरी चिंता और भारी आक्रोश की लहर दौड़ गई।

प्रतीकात्मक वादे बनाम जमीनी हकीकत का खेल

इस पूरे मामले को लेकर विवाद और पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय फजीहत इसलिए भी ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि हाल के दिनों में वहां की सरकार ने दुनिया को दिखाने के लिए अल्पसंख्यक समुदायों के सम्मान का ढोंग रचते हुए कुछ प्रतीकात्मक कदम उठाए थे। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा ने इस घटना की पुष्टि की है और डैमेज कंट्रोल की मुद्रा में आते हुए कहा है कि क्षतिग्रस्त हिस्से का दोबारा से पुनर्निर्माण कराया जाएगा। लेकिन सवाल वही खड़ा होता है कि जब सरकार सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करती है, तो स्थानीय प्रशासन की नाक के नीचे ऐसे ऐतिहासिक और संवेदनशील पूजा स्थलों तक उपद्रवी पहुंच कैसे जाते हैं?

भारत सरकार की कड़ी आपत्ति: ‘लक्षित तोड़फोड़’ करार

मामला सिर्फ स्थानीय विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत सरकार ने भी इस अमानवीय कृत्य पर बेहद सख्त और तीखी प्रतिक्रिया दी है। भारत के विदेश मंत्रालय ने इस घटना की पुरजोर निंदा करते हुए इसे “एक लक्षित तोड़फोड़” यानी टारगेटेड वैंडलिज्म करार दिया है।

विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान सरकार से साफ शब्दों में मांग की है कि इस साजिश के पीछे जो भी दोषी हैं, उनके खिलाफ तत्काल कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए, मामले की निष्पक्ष जांच हो और गुरुद्वारे के क्षतिग्रस्त हिस्से को बिना किसी देरी के उसके मूल स्वरूप में बहाल किया जाए। भारत ने वैश्विक मंच पर एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों और उनके पवित्र पूजा स्थलों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है, जो वैश्विक समुदाय के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

क्या वाकई बहाल होगा मूल स्वरूप या सिर्फ लीपापोती?

फिलहाल, पाकिस्तान के प्रशासन ने हमेशा की तरह जांच और पुनर्निर्माण का एक और नया आश्वासन दे दिया है ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम किया जा सके। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसे वादे अक्सर कागजों और बयानों की फाइलों में ही दफन होकर रह जाते हैं। अब पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे को सचमुच उसका पुराना गौरव और मूल स्वरूप वापस मिल पाएगा, या फिर यह घटना भी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के दमन की अंतहीन दास्तान का एक और स्याह पन्ना बनकर रह जाएगी।

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