अल्पसंख्यकों के ‘रक्षक’ या ज़मीन के पारखी? उत्तराखंड के ‘खान फार्म’ विवाद में वाड्रा परिवार का नाम आने पर छिड़ी नई रार

0
image (31)

Image Source: ETV Bharat

जो कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी देश भर में घूम-घूमकर खुद को अल्पसंख्यकों का एकमात्र सच्चा मसीहा बताते हैं, जो मुसलमानों के अधिकारों की बात आते ही कसीदे पढ़ने लगते हैं, उनके इस नैरेटिव के पीछे का कड़वा सच उत्तराखंड की एक ताज़ा घटना ने उजागर कर दिया है। राजनीति में जब अपना निजी फायदा या पारिवारिक रसूख आड़े आता है, तो ये तथाकथित ‘हितैषी’ अपनों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को ताक पर रखने से भी नहीं चूकते। मामला सिर्फ एक ज़मीन के विवाद का नहीं है, बल्कि इसमें गांधी-वाड्रा परिवार के सीधे तार जुड़े होने की बात सामने आ रही है।

1 जुलाई 2026: उधम सिंह नगर का हाई-प्रोफाइल ‘खान फार्म’ विवाद

यह पूरा मामला 1 जुलाई 2026 को उत्तराखंड के उधम सिंह नगर से सामने आया है, जिसे अब ‘खान फार्म’ विवाद के नाम से जाना जा रहा है। इस बहुचर्चित ज़मीन विवाद में कांग्रेस के सबसे कद्दावर परिवार के एक सदस्य का नाम सीधे तौर पर उछला है। दरअसल, प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा की बहन यानी सायरा वाड्रा का नाम इस पूरे विवाद के केंद्र में है। हैरान करने वाली बात यह है कि सायरा वाड्रा का यह कानूनी और पारिवारिक टकराव किसी बाहरी भू-माफिया से नहीं, बल्कि खुद उनकी सगी बुआ नसरीन खान के साथ चल रहा है।

पारिवारिक विवाद में कांग्रेस विधायक की एंट्री और आत्मदाह की धमकी

कायदे से देखा जाए तो यह दो रिश्तेदारों के बीच का एक पूरी तरह से निजी और घरेलू कानूनी मामला है, जिसका फैसला अदालत या प्रशासनिक जांच के जरिए होना चाहिए। लेकिन कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं की यह पुरानी आदत रही है कि वे किसी भी निजी मामले को राजनीतिक रंग देने में देर नहीं लगाते। इस मामले में कांग्रेस के स्थानीय विधायक तिलक राज बेहड़ मर्यादाओं को ताक पर रखकर खुद कूद पड़े।

विधायक साहब प्रशासनिक नियमों की परवाह किए बिना करीब 100 लोगों की भारी भीड़ लेकर सीधे धरने पर बैठ गए। उन्होंने बिना किसी कोर्ट के फैसले या प्रशासनिक दिशा-निर्देशों का इंतजार किए स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाने की राजनीति शुरू कर दी। हद तो तब हो गई जब प्रशासन पर सायरा वाड्रा के पक्ष में फैसला सुनाने का दबाव बनाने के लिए आत्मदाह तक की धमकी दे दी गई। विधायक और उनके समर्थकों द्वारा 90 वर्ष की बुजुर्ग महिला नसरीन खान के घर पहुंचकर जो हंगामा किया गया, उससे उस अल्पसंख्यक परिवार में खौफ और असुरक्षा का माहौल बन गया है।

एक तरफ देश भर में अल्पसंख्यकों के हक की दुहाई देना और दूसरी तरफ एक 90 साल की बुजुर्ग अल्पसंख्यक महिला के घर के बाहर खड़े होकर अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं के रिश्तेदारों के लिए चाटुकारिता की सारी सीमाएं लांघ जाना—यही कांग्रेस का असली चाल, चरित्र और चेहरा है।

ज़मीन और वाड्रा परिवार का पुराना ‘आकर्षण’

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा अब आम हो गई है कि खाली या विवादित ज़मीन देखते ही गांधी-वाड्रा परिवार के करीबियों का सक्रिय हो जाना कोई नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि इस परिवार का नाम समय-समय पर देश के बड़े भूमि विवादों से जुड़ता रहा है।

गुरुग्राम लैंड डील्स का मामला हो, उल्लाहावास गांव की ज़मीन हड़पने का विवाद हो, शिमला कॉटेज बाईपास का मुद्दा हो या फिर लुटियन्स दिल्ली में रियायती दरों पर वीवीआईपी बंगले हासिल करने का मामला—इन सभी विवादों में इस परिवार की संलिप्तता के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। जैसे मधुमक्खियां मीठे की तरफ अपने आप आकर्षित हो जाती हैं, ठीक वैसे ही इस इकोसिस्टम की नजरें कीमती और खाली जमीनों पर टिक जाती हैं। उधम सिंह नगर के इस खान फार्म मामले ने यह साफ कर दिया है कि रसूख के दम पर जमीनों पर कब्ज़ा जमाने और दबाव की राजनीति करने की यह प्रवृत्ति आज भी वैसी ही बनी हुई है।

निष्कर्ष: चाटुकारिता और राजनीति का घालमेल

सौ बात की एक बात यह है कि उत्तराखंड की इस घटना ने कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व की चाटुकारिता को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। स्थानीय विधायक को शायद ऐसा लगता है कि एक बुजुर्ग महिला को डरा-धमकाकर और वाड्रा परिवार के पक्ष में माहौल बनाकर वे आलाकमान की ‘गुड बुक्स’ में आ जाएंगे और उन्हें इसका राजनीतिक इनाम मिलेगा। लेकिन वे यह भूल गए कि एकतरफा वसीयत की दलीलें देकर और आत्मदाह की नौटंकी करके वे कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते। जनता साफ देख रही है कि खुद को अल्पसंख्यकों का रक्षक कहने वाले लोग सत्ता और रसूख के नशे में एक बुजुर्ग महिला के साथ कैसा सुलूक कर रहे हैं।

Leave a Reply

What’s next

Discover more from Detail News India

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading