NEET पेपर लीक विरोध प्रदर्शन का बदला पैटर्न: छात्रों के नाम पर वैश्विक प्रोपेगैंडा और ‘टूलकिट’ का नया चक्रव्यूह

0
image (32)

X: Abhijeet Dipke

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इन दिनों एक खास विरोध प्रदर्शन के वीडियो लगातार तैर रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे एक्स (X) और अन्य प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिद्म को एक सोची-समझी रणनीति के तहत प्रभावित किया गया है ताकि ये वीडियो हर उपभोक्ता की टाइमलाइन तक पहुंचते रहें। लेकिन जब आप इस पूरे घटनाक्रम की गहराई में जाएंगे, तो समझ आएगा कि नीट (NEET) पेपर लीक का जो मुद्दा विशुद्ध रूप से छात्रों के भविष्य से जुड़ा था, उसे अब पूरी तरह से एक राजनीतिक और ‘एंटी-मोदी’ स्टैंड में तब्दील कर दिया गया है।

इस आंदोलन में अब देश के कथित बुद्धिजीवियों के साथ-साथ विदेशी मीडिया घरानों की एंट्री भी हो चुकी है, जो इस पूरे प्रदर्शन को एक अलग ही दिशा देने में जुटे हैं।

विदेशी मीडिया की एंट्री: बीबीसी (BBC) के दावों की ज़मीनी हकीकत

इस पूरे विरोध प्रदर्शन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब इसमें पश्चिमी मीडिया, विशेषकर बीबीसी (BBC) ने कदम रखा। हाल ही में बीबीसी के एक लेख की हेडलाइन ने सबका ध्यान खींचा, जिसमें दावा किया गया कि प्रदर्शनकारी 40 डिग्री से अधिक की भीषण गर्मी में भी सड़कों पर डटे हुए हैं। लेकिन जब ज़मीनी वेदर रिपोर्ट्स को देखा गया, तो आंकड़े इस दावे से बिल्कुल मेल नहीं खा रहे थे।

यहाँ सवाल यह नहीं है कि नीट पेपर लीक एक गंभीर मुद्दा था या नहीं। निश्चित रूप से वह एक बड़ी प्रशासनिक चूक थी और इसकी वजह से जिन छात्रों को मानसिक तनाव झेलना पड़ा, उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि जब सरकार ने इस मामले पर संज्ञान लिया, प्रभावित छात्रों के लिए री-एग्जाम (पुनः परीक्षा) का आयोजन करा दिया और अब छात्र अपनी काउंसलिंग और कॉलेज अलॉटमेंट का इंतज़ार कर रहे हैं, तो फिर ये प्रदर्शनकारी अभी भी सड़कों पर क्यों बैठे हैं?

छात्र आंदोलन की आड़ में उमर ख़ालिद और आज़ादी के नारे

अगर यह आंदोलन सिर्फ और सिर्फ देश के ईमानदार छात्रों के हक के लिए है, तो इसमें जेएनयू (JNU) के वामपंथी छात्र संगठनों का दखल क्यों बढ़ता जा रहा है? सोचने वाली बात यह है कि देश की शिक्षा व्यवस्था के सुधार की मांग के बीच अचानक:

  • जेल में बंद उमर ख़ालिद के समर्थन में नारे क्यों लगने लगते हैं?
  • देश की चुनी हुई सरकार और प्रधानमंत्री के खिलाफ व्यक्तिगत अभद्र भाषा का इस्तेमाल क्यों किया जाता है?
  • राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और अन्य सांस्कृतिक संगठनों के खिलाफ नारेबाज़ी का क्या औचित्य है?

पश्चिमी मीडिया जैसे ‘द गार्डियन’ और ‘बीबीसी’ आपको कभी यह पहलू नहीं दिखाएंगे। वे केवल एकतरफा नैरेटिव पेश करेंगे कि कैसे कुछ लोग धूप में संघर्ष कर रहे हैं, जबकि हकीकत में प्रदर्शन के नाम पर तंबू-पंखों के नीचे बैठकर केवल राजनीति चमकाई जा रही है।

शाहीन बाग और किसान आंदोलन वाले ‘पैटर्न’ का दोहराव

इस प्रदर्शन के काम करने के तरीके, रसद और रसोइयों की व्यवस्था को अगर आप ध्यान से देखेंगे, तो यह हूबहू शाहीन बाग और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के वक्त हुए प्रदर्शनों की याद दिलाता है।

विरोध प्रदर्शनों का एक तयशुदा टूलकिट बन चुका है। आंदोलन की आड़ में भोजन, चाय और भारी फंडिंग की व्यवस्था की जाती है, सामूहिक रूप से धार्मिक गतिविधियां की जाती हैं, जिसे पश्चिमी मीडिया ‘लोकतंत्र की खूबसूरत तस्वीर’ कहकर महिमामंडित करता है। लेकिन जैसे ही बहुसंख्यक समाज की आस्था का कोई प्रतीक वहां सामने आता है, तो यही मीडिया उसे तुरंत ‘सांप्रदायिक’ घोषित करने पर उतारू हो जाता है।

यहाँ तक कि इस आंदोलन को हवा देने के लिए सोनम वांगचुक जैसे चेहरों के नाम का भी इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि वैश्विक स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी की छवि को धूमिल किया जा सके।

आंदोलन की कोख से नई सियासी पार्टी बनाने का पुराना फॉर्मूला

सौ बात की एक बात यह है कि जिन असली छात्र-छात्राओं का नीट एग्जाम का मुद्दा था, वे परीक्षा की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब अपने नतीजों और भविष्य की तैयारी में व्यस्त हैं। लेकिन जो लोग आज भी सड़कों को जाम करके बैठे हैं, उन्हें छात्रों के भविष्य से कोई सरोकार नहीं है। उनका एकमात्र एजेंडा प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार का विरोध करना है।

यह पूरा पैटर्न देश को अच्छी तरह याद दिलाता है कि कैसे कभी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नाम पर एक मंच तैयार किया गया था और बाद में उसी की कोख से ‘आम आदमी पार्टी’ जैसी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं पैदा हुईं। इतिहास खुद को दोहरा रहा है, बस इस बार मोहरा देश के मासूम छात्रों को बनाया गया है।

Leave a Reply

What’s next

Discover more from Detail News India

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading