सुप्रिया श्रीनेत का विवादित बयान, प्रभु श्री राम को ‘इमाम-ए-हिन्द’ बताने पर बवाल

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कांग्रेस पार्टी देश में कितनी भी कोशिशें कर ले, लेकिन उसके इकोसिस्टम का बड़बोलापन और तुष्टिकरण की नीति बार-बार उसे कटघरे में खड़ा कर देती है। राहुल गांधी के भस्म लगाने या तिलक लगाने से जो डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की जाती है, उस पर पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने अपने एक ही बयान से पानी फेर दिया है।

कांग्रेस ने खुद को एक बार फिर सॉफ्ट-हिंदुत्व की राह पर दिखाने के लिए एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया था। सुप्रिया श्रीनेत भी शायद इसी होड़ में थीं कि भगवान राम का नाम लेकर अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत किया जाए, लेकिन खुद को सबसे बड़ा सेक्युलर और हिंदूवादी साबित करने के चक्कर में उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम को ‘इमाम-ए-हिन्द’ कह दिया। उन्होंने इसके पीछे अल्लामा इकबाल की एक पुरानी कविता का तर्क दिया, लेकिन उनका यह दांव पूरी तरह उल्टा पड़ चुका है।

आस्था का अपमान या राजनीतिक कुंठा?

सुप्रिया श्रीनेत के इस बयान के बाद देश के बहुसंख्यक समाज और सांस्कृतिक विचारकों में भारी आक्रोश है। सार्वजनिक विमर्श में यह तीखा सवाल पूछा जा रहा है कि जिन प्रभु श्री राम को करोड़ों सनातनी इस पूरी सृष्टि का पालनहार और भगवान मानते हैं, उनकी तुलना किसी इमाम से कैसे की जा सकती है? क्या सुप्रिया श्रीनेत या उनकी पार्टी के किसी अन्य नेता में इतनी हिम्मत है कि वे किसी दूसरे धर्म के पूजनीय प्रतीकों या पैगंबरों को लेकर इस तरह की तुलनात्मक टिप्पणी किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कर सकें?

आलोचकों का साफ कहना है कि यह उसी पुराने कांग्रेसी वायरस का असर है जो राम मंदिर के निर्माण पर सवाल उठाता था, जिन्हें राम जी के अस्तित्व से ज्यादा गाजा की फिक्र रहती थी और जो अपने टोपी वाले विशेष वोट बैंक को खुश करने के लिए बहुसंख्यकों की आस्था को ठेस पहुंचाने से भी नहीं कतराते थे। सेक्युलरिज्म का असली मतलब यह कतई नहीं होता कि अपनी राजनीति चमकाने के लिए हिंदू धर्म को नीचा दिखाया जाए। सुप्रिया श्रीनेत को यह समझना चाहिए कि किसी मनुष्य की राजनीतिक बयानबाजी से भगवान का कद छोटा नहीं होता, लेकिन इस तरह की हरकतें कांग्रेस की उस सांस्कृतिक और धार्मिक समझ को पूरी तरह बेनकाब कर देती हैं जो सिर्फ चुनाव देखकर बदलती है।

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