अरविंद केजरीवाल के ‘मासूम प्रदर्शनकारी’ और ज़मीनी सच: जंतर-मंतर हिंसा, वायरल वीडियो और पंजाब पुलिस का लाठीचार्ज!
जब भी कोई अरविंद केजरीवाल को “फर्जीवाल” कहता था, तो अक्सर लगता था कि किसी जनप्रतिनिधि या राजनेता के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल सही नहीं है। लेकिन वक्त के साथ सामने आ रही तस्वीरों और बयानों ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर सच क्या है। रंग बदलने के मामले में जिस तरह की राजनीति देखने को मिल रही है, उसने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाल ही में अरविंद केजरीवाल मीडिया के सामने बैठकर बड़ी सहजता से यह पूछते नजर आए कि क्या कोई एक भी ऐसा प्रदर्शनकारी दिखा सकता है, जिसके हाथ में बंदूक थी या जिसके हाथ में डंडा था?
‘निहत्थे बच्चों’ का सच और कैमरे में कैद हिंसा
केजरीवाल जी के इस सवाल का जवाब सोशल मीडिया पर तैरते वे वीडियो दे रहे हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। प्रदर्शनकारियों के हाथों में डंडा भले न दिख रहा हो, लेकिन बड़े-बड़े पत्थर साफ़ नज़र आ रहे थे, जिनसे पुलिस वालों पर सीधा हमला किया जा रहा था। यहाँ तक कि एक आरपीएफ (RPF) जवान के साथ भीड़ द्वारा हिंसा की कोशिश की गई, जहाँ एक्टिविस्ट अभिजीत दीपके भी मौजूद बताए गए। लेकिन जब स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की, तो उसे तुरंत ‘मासूम बच्चों पर लाठीचार्ज’ का रूप देकर प्रचारित किया जाने लगा।
केजरीवाल जी ने इन प्रदर्शनकारियों को “अच्छे घर के बच्चे” और “निहत्थे बच्चे” करार दिया।
अब ज़रा इन ‘अच्छे घर के बच्चों’ के संस्कारों और हरकतों की असलियत भी देख लीजिए। प्रदर्शन की आड़ में देश के प्रधानमंत्री को गोली मारने की धमकियाँ दी गईं। पीएम के खिलाफ अभद्र और sexual comment की गईं, अशोभनीय इशारे किए गए। इतना ही नहीं, मैदान में मौजूद पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई, उनके साथ मारपीट हुई और यहाँ तक कि कपड़े फाड़ने जैसी घटनाएँ सामने आईं। क्या वाकई किसी सभ्य समाज में इसे ‘अच्छे घर के बच्चों’ का आचरण कहा जाएगा?
जनरल डायर से तुलना और पंजाब का सच
कहानी सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। इससे पहले भी अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री की तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड के जिम्मेदार जनरल डायर से कर दी थी और कहा था कि मोदी जी तो उससे भी आगे निकल गए।
लेकिन केजरीवाल जी शायद यह भूल जाते हैं कि पंजाब में उन्हीं की आम आदमी पार्टी की सरकार है और भगवंत मान वहाँ के मुख्यमंत्री हैं।
अगर लाठीचार्ज और तानाशाही की ही बात करनी है, तो पंजाब का सच भी देखना होगा। एक तरफ जहाँ पंजाब में हाल ही में भर्ती परीक्षा में बड़े नकल माफिया का भंडाफोड़ हुआ है, वहीं कुछ ही समय पहले जून के महीने में जब आईटीआई (ITI) अभ्यर्थी PSPCL के बाहर अपने हक के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, तब पंजाब पुलिस ने उन पर बेरहमी से लाठियाँ बरसाई थीं। क्या उस वक्त पंजाब की पुलिस ‘जनरल डायर’ नहीं बनी थी?
डिजिटल दौर में बयानों का हिसाब
आज हम डिजिटल युग में जी रहे हैं। अब कुछ भी छिपाना आसान नहीं है। हर बयान, हर वीडियो और हर घटना का रिकॉर्ड इंटरनेट पर मौजूद है। जब बयानों को एक साथ रखकर देखा जाता है, तो दोहरे मापदंड अपने आप उजागर हो जाते हैं। इसलिए नेताओं को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से पहले अपने पुराने बयानों और तथ्यों का ख़याल ज़रूर रखना चाहिए।
देश के युवाओं से भी यही अपील है कि वे किसी भी राजनीतिक दल के ऐसे स्टंट और एजेंडे का मोहरा न बनें। छात्र हित की आड़ में जो राजनीतिक रोटियाँ सेकी जा रही हैं, उन्हें समझना बेहद ज़रूरी है।
