NEET विवाद के बाद फिर क्यों भड़का प्रदर्शन? छात्रों के आंदोलन में राजनीति की एंट्री पर उठे सवाल
NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। परीक्षा में गड़बड़ियों की शिकायतों के बाद सरकार ने जांच शुरू कराई, कार्रवाई का भरोसा दिया और प्रभावित अभ्यर्थियों के लिए दोबारा परीक्षा आयोजित की। इसके बाद भी विरोध जारी रहने पर कई राजनीतिक सवाल खड़े होने लगे हैं।
पेपर लीक के बाद सरकार ने क्या कदम उठाए ?
NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक की खबर सामने आने के बाद लाखों छात्र और अभिभावक चिंतित हो गए थे। सरकार ने मामले की जांच केंद्रीय एजेंसियों को सौंपी और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। जिन अभ्यर्थियों पर प्रभाव पड़ा, उनके लिए दोबारा परीक्षा आयोजित की गई ताकि उनका शैक्षणिक वर्ष प्रभावित न हो।
री-एग्जाम के बाद बदला आंदोलन का स्वरूप
री-एग्जाम का परिणाम घोषित होने के बाद अधिकांश प्रभावित छात्रों की काउंसलिंग और प्रवेश प्रक्रिया आगे बढ़ने लगी। इसके बावजूद दिल्ली में प्रदर्शन जारी रहा। यहीं से यह सवाल उठने लगा कि जब परीक्षा से जुड़ी प्रमुख मांगों पर कार्रवाई हो चुकी थी, तब आंदोलन का उद्देश्य क्या रह गया था।
प्रदर्शन में राजनीतिक चेहरों की मौजूदगी पर बहस
प्रदर्शन के दौरान कई सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने विवाद को और बढ़ा दिया। भाजपा और उसके समर्थकों का आरोप है कि छात्र आंदोलन का इस्तेमाल कुछ राजनीतिक समूह अपने एजेंडे के लिए कर रहे थे। वहीं आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि उनकी मांगें केवल परीक्षा तक सीमित नहीं थीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार और जवाबदेही से भी जुड़ी थीं।
हिंसा और तोड़फोड़ के आरोप
दिल्ली में संसद की ओर मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की खबरें सामने आईं। पुलिस ने आरोप लगाया कि बैरिकेडिंग तोड़ी गई, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और सुरक्षाकर्मियों पर पथराव हुआ। दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए और कहा कि उनका प्रदर्शन शांतिपूर्ण था। इन घटनाओं की जांच जारी है।
अब बहस छात्रों की नहीं, राजनीति की?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी बड़े छात्र आंदोलन में राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी नई बात नहीं है। लेकिन जब मूल मांगों पर कार्रवाई शुरू हो जाए और उसके बाद भी आंदोलन जारी रहे, तो उसके उद्देश्य और नेतृत्व पर सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है। फिलहाल यह बहस जारी है कि आंदोलन केवल छात्रों के हितों तक सीमित था या फिर उसमें राजनीतिक हित भी जुड़ गए थे।
