खुल गए ‘संसद मार्च’ के राज! FCRA कानून से क्या है कनेक्शन?
आपके सोशल मीडिया फीड्स पर ऐसे दर्जनों वीडियो तैर रहे होंगे, जिनमें दिखाया जा रहा है कि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर कितनी ज्यादती की। पर क्या आपने रुककर खुद से एक सवाल पूछा – संसद मार्च ही क्यों? और वो भी ठीक उसी दिन जिस दिन मानसून सत्र शुरू होने वाला था?
अगर आप थोड़ा ध्यान देंगे तो इसका सिर्फ़ एक ही मुख्य कारण समझ आएगा-FCRA Amendment Bill 2026.
क्या है FCRA नोटिफिकेशन का पूरा खेल?
22 जून को गृह मंत्रालय की तरफ से FCRA यानी Foreign Contribution Regulation Act को लेकर एक अधिसूचना जारी की जाती है। अधिसूचना आते ही पूरा विपक्ष और फॉरेन फंडिंग के सहारे अपनी दुकानें चलाने वाले लोग अचानक चिल्लाने लगे।
इस नोटिफिकेशन के कुछ ही दिनों बाद आधिकारिक घोषणा होती है कि सरकार FCRA Amendment Bill 2026 मानसून सत्र में पेश करने जा रही है।
इस नए नियम की सबसे बड़ी बात क्या है? अगर किसी संस्था या एनजीओ का FCRA लाइसेंस रद्द होता है, सरेंडर किया जाता है या समय पर रिन्यू नहीं होता… तो विदेशी फंड से बनाई गई उसकी तमाम संपत्तियों का कंट्रोल एक Designated Authority के पास चला जाएगा। अब विदेशी पैसे का इस्तेमाल सिर्फ उसी काम के लिए किया जा सकेगा, जिसके लिए वह आया है।
बस! असली दिक्कत यहीं से शुरू हो गई।
‘आंदोलनजीवियों’ के तार और फंडिंग का हिसाब-किताब
आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव से लेकर प्रशांत भूषण और अभिनेता प्रकाश राज को तो आप जानते ही होंगे। लेकिन इस पूरे खेल के पीछे दो प्रमुख महिला चेहरे भी शामिल हैं।
पहली हैं शबाना आज़मी, जो कहने को तो एक मशहूर एक्ट्रेस हैं, लेकिन असल पहचान ‘आंदोलनजीवी’ की है। ये ActionAid नाम के एनजीओ की चेयरपर्सन भी हैं।
दूसरी हैं अंजलि भारद्वाज, जिन्हें यूएस एम्बेसी की तरफ से अवॉर्ड तक दिया जा चुका है।
अगर आप ActionAid की बैलेंस शीट उठाकर देखेंगे, तो आपको सारे डॉट्स कनेक्ट होते दिखेंगे। वित्त वर्ष 2023 में इनका कुल फंड 69 करोड़ रुपये था, जिसमें फॉरेन कंट्रीब्यूशन 22 करोड़ रुपये था। वहीं वित्त वर्ष 2024 में कुल फंड 22 करोड़ रुपये रहा, जिसमें फॉरेन कंट्रीब्यूशन 17 करोड़ रुपये था।

सोचिए! कागजी बैलेंस शीट में जब करोड़ों का डेटा साफ दिख रहा है, तो असलियत में क्या खेल चल रहा होगा? और आज यही सारे लोग CJP के मंच पर मौजूद दिखते हैं—एक दूसरे को नींबू पानी पिलाकर भूख हड़ताल तुड़वाते हुए।
विदेशी मिर्ची और ‘धर्मांतरण’ पर लगाम
सरकार की अधिसूचना में यह साफ़ कर दिया गया है कि विदेशी फंडिंग की आड़ में अब धर्मांतरण का धंधा ख़त्म किया जाएगा।
इस FCRA कानून से सिर्फ भारत के ‘आंदोलनजीवियों’ को ही दर्द नहीं हुआ है, बल्कि विदेश में भी इसकी मिर्ची लगी है। क्या आपने कभी सोचा है कि यूएस के विदेश सचिव मार्को रुबियो भारत आने के बाद सीधे कोलकाता के मदर टेरेसा हाउस क्यों जाते हैं? दरअसल, अमेरिका खुद भारत के इस कड़े FCRA नियम का विरोध करता रहा है।
NEET का मुद्दा कहाँ गायब हुआ?
अब सवाल यह उठता है कि जिस NEET के मुद्दे पर हंगामा खड़ा किया गया था, वह अचानक कहाँ गायब हो गया?
सच तो यह है कि संसद मार्च को सिर्फ एक ढाल बनाया गया है, ताकि FCRA Amendment Bill किसी भी तरह पास न हो पाए। ये लोग कभी नहीं चाहते कि इनके विदेशी फंडिंग के राज जनता के सामने आएँ।
