क्या शीत युद्ध के दौरान KGB का भारत की राजनीति में था दखल? मित्रोखिन आर्काइव्स में क्या किए गए हैं दावे

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शीत युद्ध (Cold War) के दौरान भारत आधिकारिक रूप से गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) का प्रमुख चेहरा था। हालांकि, वर्षों बाद सामने आए मित्रोखिन आर्काइव्स (Mitrokhin Archives) ने भारतीय राजनीति और सोवियत संघ के संबंधों को लेकर कई गंभीर दावे किए। इन दस्तावेजों के अनुसार, सोवियत खुफिया एजेंसी केजीबी (KGB) ने भारत में केवल कूटनीतिक संबंधों तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया को भी प्रभावित करने की कोशिश की।

कौन थे वासिली मित्रोखिन?

वासिली मित्रोखिन सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी KGB में वरिष्ठ अभिलेखपाल (Archivist) थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद वे बड़ी संख्या में गुप्त नोट्स और दस्तावेजों की प्रतियां लेकर पश्चिम पहुंचे। बाद में ब्रिटिश इतिहासकार क्रिस्टोफर एंड्रयू के साथ मिलकर उन्होंने The Mitrokhin Archive नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें दुनिया के कई देशों में KGB की कथित गतिविधियों का विस्तार से उल्लेख किया गया।

भारत को लेकर क्या हैं प्रमुख दावे?

मित्रोखिन आर्काइव्स में दावा किया गया है कि KGB ने भारत में कई राजनीतिक नेताओं, सरकारी अधिकारियों और पत्रकारों के साथ संपर्क विकसित किए थे। पुस्तक के अनुसार, सोवियत एजेंसी ने भारतीय राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए आर्थिक सहायता, गोपनीय सूचनाओं के आदान-प्रदान और राजनीतिक नेटवर्क का इस्तेमाल किया।

सबसे चर्चित दावों में यह भी शामिल है कि 1967 के आम चुनावों में KGB से जुड़े नौ एजेंट चुनाव जीतकर भारतीय संसद तक पहुंचे थे। हालांकि, पुस्तक में इन सभी व्यक्तियों की सार्वजनिक रूप से पहचान स्पष्ट नहीं की गई है और इन दावों पर अलग-अलग इतिहासकारों की अलग-अलग राय रही है।

सीक्रेट ट्रेडिंग कंपनी और राजनीतिक फंडिंग का दावा

मित्रोखिन आर्काइव्स में यह भी दावा किया गया है कि भारत में वामपंथी नेताओं से जुड़े लोगों के सहयोग से एक आयात-निर्यात (Import-Export) कंपनी बनाई गई थी। आरोप है कि इस कंपनी के जरिए सोवियत व्यापार से होने वाले लाभ का एक हिस्सा राजनीतिक गतिविधियों और चुनावी अभियानों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इन आरोपों ने उस समय भारतीय राजनीति में विदेशी प्रभाव और चुनावी फंडिंग को लेकर नई बहस छेड़ दी थी।

इंदिरा गांधी का भी हुआ उल्लेख

मित्रोखिन आर्काइव्स में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस से जुड़े कुछ संदर्भों का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि, इन दावों को लेकर भारत में लंबे समय तक राजनीतिक विवाद बना रहा। कई नेताओं और इतिहासकारों ने इन आरोपों को गंभीर बताते हुए जांच की मांग की, जबकि कांग्रेस ने इन निष्कर्षों को खारिज किया और इन्हें निर्णायक प्रमाण नहीं माना।

इतिहासकारों के बीच आज भी जारी है बहस

मित्रोखिन आर्काइव्स को शीत युद्ध के इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है, लेकिन इसके सभी दावों को अंतिम सत्य नहीं माना जाता। कई शोधकर्ता इसे महत्वपूर्ण खुफिया दस्तावेज मानते हैं, जबकि अन्य इतिहासकारों का कहना है कि इन दावों की स्वतंत्र और न्यायिक स्तर पर पूरी पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

यही कारण है कि KGB और भारतीय राजनीति के कथित संबंध आज भी इतिहास, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन का एक विवादित लेकिन बेहद चर्चित विषय बने हुए हैं।

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