राम मंदिर के बाद अब गौशाला घोटाला? राजस्थान की रिपोर्ट पर क्यों छिड़ी सियासी बहस
“क्या राम मंदिर के बाद अब गौ माता के नाम पर चल रही योजना में घोटाला हुआ? पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और कई मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसे दावे खूब देखने को मिल रहे हैं। लेकिन क्या पूरी कहानी उतनी ही है, जितनी दिखाई जा रही है? या फिर इस मामले में कुछ अहम तथ्य भी हैं, जिन पर कम चर्चा हो रही है?”
पिछले कुछ दिनों से राजस्थान की गौशालाओं में अनुदान वितरण को लेकर सामने आई अनियमितताओं की खबरें सुर्खियों में हैं। कई सोशल मीडिया पोस्ट और कुछ राजनीतिक टिप्पणियों में इसे सीधे मौजूदा बीजेपी सरकार से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इस पूरे मामले में वित्तीय वर्ष (FY) और जांच की समय-सीमा को लेकर भी बहस छिड़ गई है।
दरअसल, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मामला वित्तीय वर्ष 2023-24 से जुड़ा है। यहीं से राजनीतिक विवाद शुरू होता है, क्योंकि राजस्थान में बीजेपी सरकार दिसंबर 2023 में सत्ता में आई थी। ऐसे में सवाल उठाया जा रहा है कि जिस वित्तीय वर्ष की अनियमितताओं की बात हो रही है, उसका अधिकांश समय किस सरकार के कार्यकाल में आता है?
हालांकि, यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि अनियमितताएं सामने आने और उनके लिए जिम्मेदारी तय होना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी भी वित्तीय वर्ष की गड़बड़ियों के लिए अंतिम निष्कर्ष जांच और आधिकारिक कार्रवाई के बाद ही तय होते हैं।

अब बात करते हैं महालेखाकार (Accountant General) की रिपोर्ट की।
रिपोर्ट के आधार पर गोपालन विभाग ने 38 गौशालाओं से 57.36 करोड़ रुपये की वसूली के आदेश जारी किए हैं। इसके तहत 29 मई 2026 को संबंधित गौशालाओं को नोटिस भेजे गए और निर्धारित समय के भीतर राशि जमा कराने के निर्देश दिए गए। नोटिस में यह भी कहा गया कि यदि तय समय में राशि जमा नहीं कराई गई, तो संबंधित गौशालाओं की आगामी प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृतियां रोक दी जाएंगी।
यहीं से राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए।
कुछ लोगों का कहना है कि मीडिया रिपोर्ट्स में केवल “राजस्थान सरकार” लिखे जाने से आम पाठकों के बीच यह धारणा बन सकती है कि पूरा मामला मौजूदा सरकार के कार्यकाल का है। वहीं दूसरी ओर, कई रिपोर्ट्स में यह भी उल्लेख किया गया है कि अनियमितताओं का संबंध पूर्ववर्ती अवधि से जुड़ा है और वर्तमान सरकार ने जांच के बाद कार्रवाई शुरू की।
इसी संदर्भ में वर्ष 2025 की कुछ रिपोर्ट्स का भी जिक्र किया जा रहा है, जिनमें बताया गया था कि राजस्थान सरकार ने गौशालाओं में कथित फर्जीवाड़े को रोकने के लिए तकनीकी बदलाव किए। इनमें गोपालन विभाग के ऐप में सुधार, डुप्लीकेट टैगिंग रोकने और अनुदान प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने जैसे कदम शामिल बताए गए थे।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है…
क्या इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक नैरेटिव तथ्यों से आगे निकल गया है? क्या वित्तीय वर्ष और सरकार के कार्यकाल के बीच के अंतर को पर्याप्त तरीके से समझाया जा रहा है? और जांच पूरी होने के बाद जिम्मेदारी आखिर किस पर तय होगी?
फिलहाल इतना तय है कि राजस्थान की गौशाला अनुदान योजना में सामने आई अनियमितताओं ने राजनीतिक बहस को जरूर तेज कर दिया है। लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच, आधिकारिक रिकॉर्ड और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।
