यूपी चुनाव 2027: अखिलेश का ‘केजरीवाल कार्ड’… राहुल गांधी को लगेगा सबसे बड़ा झटका, बिखर जाएगा गठबंधन?

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सूबे की सियासत में एक बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है। भले ही चुनाव में अभी वक्त बाकी है, लेकिन लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में एक ऐसा भूचाल आया है, जिसने कांग्रेस के भीतर हड़कंप मचा दिया है। राजनीतिक हलकों में इस समय सिर्फ एक ही सवाल तैर रहा है क्या 2027 में अखिलेश यादव की ‘साइकिल’ पर आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल सवार होने जा रहे हैं? और क्या केजरीवाल की एंट्री होते ही कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के इस बड़े सियासी गठबंधन से साइड कर दिया जाएगा?

राहुल के सामने झुकने को तैयार नहीं सपा

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली भारी सफलता के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव का कॉन्फिडेंस सातवें आसमान पर है। अखिलेश अब राहुल गांधी के सामने रत्ती भर भी झुकने के मूड में नहीं हैं। उनका लक्ष्य बिल्कुल साफ है किसी भी कीमत पर उत्तर प्रदेश की सत्ता में समाजवादी पार्टी की धमाकेदार वापसी कराना। इसी रणनीति के तहत सपा अब नए समीकरणों को साधने में जुट गई है।

पर्दे के पीछे ‘बड़ी डील’ की तैयारी!

पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स और पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो यूपी की चुनावी जंग में इस बार आम आदमी पार्टी एक बहुत बड़ा धमाका करने की फिराक में है। दिल्ली और लखनऊ में ‘आप’ की बढ़ती हलचलें साफ इशारा कर रही हैं कि अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव के बीच पर्दे के पीछे एक बहुत बड़ी डील फाइनल होने वाली है। पिछले एक साल से ‘आप’ के यूपी प्रभारी संजय सिंह उत्तर प्रदेश के मैदान में पूरी ताकत से डटे हुए हैं। वे लगातार रैलियां कर रहे हैं और पार्टी के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी का प्लान बिल्कुल सेट है दिल्ली और पंजाब में मुफ्त बिजली और मुफ्त पानी के जिस मॉडल का ढिंढोरा पीटा गया था, उसे अब यूपी की जनता के सामने समाजवादी पार्टी के मंच से भुनाया जाएगा।

कांग्रेस से ज्यादा केजरीवाल पर भरोसा?

अखिलेश यादव भी अच्छी तरह जानते हैं कि यूपी के शहरी वोटरों पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की बेहद मजबूत पकड़ है, और इसी वोट बैंक को टारगेट करने के लिए वे केजरीवाल को साथ ला रहे हैं। यह नजदीकी कोई नई नहीं है। याद करिए, जब दिल्ली में केजरीवाल मुश्किलों में घिरे थे, तो अखिलेश यादव खुद उनके समर्थन में दिल्ली पहुंचे थे। यही नहीं, हरियाणा चुनाव में भी अखिलेश ने कांग्रेस की परवाह किए बिना ‘आप’ का खुलकर साथ दिया था। यानी अखिलेश ने बहुत पहले ही यह साफ संकेत दे दिए थे कि उनके लिए कांग्रेस से ज्यादा जरूरी केजरीवाल हैं।

राहुल गांधी की सबसे बड़ी ‘बेइज्जती’ की स्क्रिप्ट!

सपा और AAP के इस नए बनते समीकरण ने कांग्रेस और राहुल गांधी को सबसे बड़ा झटका दिया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के कंधे पर बैठकर कांग्रेस ने यूपी में कुछ सीटें क्या जीत लीं, कांग्रेस के नेता खुद को उत्तर प्रदेश का बड़ा भाई समझने लगे। यही वजह है कि कांग्रेस लगातार ‘बराबर सम्मान’ और ‘बराबर हिस्सेदारी’ की रट लगाकर अखिलेश यादव पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। वहीं दूसरी तरफ, सपा भी कांग्रेस को बार-बार उसकी जमीनी औकात याद दिलाने से बाज नहीं आ रही। हाल ही में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और कई बड़े कांग्रेसी नेताओं के जो बयान सामने आए हैं, उसने दोनों पार्टियों के बीच की खटपट को सरेआम चौराहे पर ला खड़ा किया है। कांग्रेस नेताओं का साफ़ कहना है:

“हम सपा से सीटों की भीख नहीं मांग रहे, हमें गठबंधन में बराबर की हिस्सेदारी चाहिए।”

अभी चुनाव का बिगुल फुंका भी नहीं है और कांग्रेस के नेता अभी से गिड़गिड़ाने वाले मोड में आ चुके हैं। लेकिन मौजूदा हालात यही गवाही दे रहे हैं कि अखिलेश यादव अब कांग्रेस के नखरे उठाने के मूड में कतई नहीं हैं। अगर अखिलेश यादव ने कांग्रेस को दरकिनार किया और आम आदमी पार्टी जैसी छोटी पार्टियों को ज्यादा तवज्जो दी, तो यह देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए और खासकर राहुल गांधी के लिए इतिहास की सबसे बड़ी बेइज्जती होगी। साल 2017 में ‘यूपी के दो लड़कों’ की जो तस्वीर चमकाई गई थी, वो पूरी तरह तार-तार हो जाएगी। भूलिए मत, राहुल गांधी खुद यूपी की रायबरेली सीट से सांसद हैं, और अगर ऐसे में सपा ने कांग्रेस को साइड कर दिया, तो राहुल गांधी के लिए उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन बचाना भी नामुमकिन हो जाएगा।

ताश के पत्तों की तरह बिखरेगा ‘INDIA’ गठबंधन?

यह अब कोई अंदरूनी खींचतान नहीं, बल्कि सीधे-सीधे वर्चस्व की जंग बन चुकी है। अखिलेश यादव भली-भांति भांप चुके हैं कि कांग्रेस जहां भी क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन में आती है, वहां धीरे-धीरे सहयोगी पार्टी की स्थिति को ही कमजोर कर देती है। यही वजह है कि अखिलेश अब कांग्रेस के पर कतरने की पूरी तैयारी कर चुके हैं। सपा आगामी चुनाव में कांग्रेस को इतनी कम सीटें ऑफर करने की रणनीति बना रही है कि या तो कांग्रेस घुटने टेक दे, या फिर खुद मजबूर होकर गठबंधन तोड़कर भाग जाए।

अगर ऐसा होता है, तो जो ‘INDIA’ गठबंधन बीते कई दिनों से बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था, वो 2027 आते-आते यूपी के इस सियासी दंगल में ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगा। सीटों के बंटवारे की ये लड़ाई आने वाले दिनों में और भी ज्यादा गंदी, तीखी और आक्रामक होने वाली है।

विपक्ष के ड्रामे पर बीजेपी की नजर

एक तरफ जहां विपक्ष में सरेआम सिर-फुटौव्वल मची है और राहुल गांधी की बेइज्जती की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी शांत बैठकर इस पूरे तमाशे को देख रही है और अपनी रणनीति को और धार दे रही है। बीजेपी यूपी में नए चेहरों, नए सामाजिक समीकरणों और बूथ स्तर पर अपनी पकड़ को और मजबूत करने में जुट गई है। बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह अच्छी तरह जानते हैं कि जब विपक्ष आपस में ही लड़कर मरेगा, तो सत्ता का रास्ता उनके लिए खुद-ब-खुद साफ हो जाएगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश यादव का ये ‘केजरीवाल कार्ड’ यूपी में राहुल गांधी के राजनीतिक रसूख को खत्म कर देगा? या फिर 2027 में बीजेपी एक बार फिर विपक्ष के इस बिखराव का फायदा उठाकर लखनऊ की सत्ता पर प्रचंड बहुमत से काबिज हो जाएगी? यूपी की सियासत का ऊंट किस करवट बैठेगा, ये तो वक्त ही बताएगा, लेकिन एक बात बिल्कुल तय है कि अखिलेश के इस चक्रव्यूह में राहुल गांधी इस वक्त बुरी तरह फंस चुके हैं।

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