गुजरात सरकार का नया Anti-Radicalisation SOP, The Wire ने क्यों उठाए सवाल?

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“क्या गुजरात सरकार अब कट्टरपंथ से निपटने के लिए एक बिल्कुल नया मॉडल लेकर आई है? या फिर, जैसा कुछ आलोचक कह रहे हैं, यह SOP एक खास समुदाय को निशाना बना सकती है? यही बहस इस समय तेज हो गई है।”

गुजरात सरकार की ओर से जारी एक नए Anti-Radicalisation Standard Operating Procedure (SOP) ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार का दावा है कि यह व्यवस्था युवाओं को कट्टरपंथ की ओर जाने से रोकने और उन्हें मुख्यधारा में वापस लाने के लिए बनाई गई है। वहीं दूसरी तरफ The Wire सहित कुछ मीडिया संस्थानों ने इस SOP पर सवाल उठाए हैं और इसे लेकर कई आशंकाएं जताई हैं।

दरअसल, गुजरात सरकार ने अपने Anti-Radicalisation Cell (ARC) को औपचारिक रूप से लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए राज्य के सभी जिला और पुलिस कमिश्नरेट कार्यालयों को एक विस्तृत Standard Operating Procedure (SOP) जारी की है।

अब सवाल यह है कि आखिर इस SOP में ऐसा क्या है, जिस पर इतना विवाद हो रहा है?

सरकार ने कट्टरपंथ से निपटने के लिए पांच-स्तरीय मॉडल तैयार किया है, जिसमें Prevention, Detection, Intervention, Rehabilitation और Monitoring शामिल हैं।

1. रोकथाम (Prevention)

पहले चरण का उद्देश्य कट्टरपंथी प्रचार को शुरुआती स्तर पर रोकना है। इसके तहत पुलिस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन फोरम, मैसेजिंग ऐप्स और संदिग्ध नेटवर्क की निगरानी करेगी, ताकि कट्टरपंथी सामग्री के प्रसार पर नजर रखी जा सके।

2. पहचान (Detection)

इस चरण में अधिकारियों को ऐसे व्यवहारिक, डिजिटल और वित्तीय संकेतों की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं, जिनसे किसी व्यक्ति के कट्टरपंथ की ओर बढ़ने का संदेह हो सकता है। SOP में जिन संकेतों का उल्लेख किया गया है, उनमें अचानक दाढ़ी बढ़ाना या नकाब पहनना, बातचीत में बार-बार अरबी शब्दों का प्रयोग, परिवार और दोस्तों से दूरी बनाना, वैश्विक मुस्लिम घटनाक्रमों पर अत्यधिक प्रतिक्रिया देना, आतंकवादियों का महिमामंडन करना तथा संघर्ष प्रभावित विदेशी क्षेत्रों की यात्रा के बाद व्यवहार में बदलाव जैसे बिंदु शामिल हैं।

3. हस्तक्षेप (Intervention)

यदि किसी व्यक्ति में ऐसे संकेत मिलते हैं, तो जिला प्रशासन डी-रेडिकलाइजेशन प्रक्रिया के तहत सामुदायिक नेताओं, धार्मिक विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की मदद से उसे समझाने और मुख्यधारा में बनाए रखने की कोशिश करेगा।

4. पुनर्वास (Rehabilitation)

सरकार का कहना है कि इस चरण का उद्देश्य लोगों को समाज से दोबारा जोड़ना है। इसके लिए सेमिनार, सामुदायिक पुलिसिंग, खेल प्रतियोगिताएं, कौशल विकास कार्यक्रम और रोजगार मेलों जैसी गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा।

5. दीर्घकालिक निगरानी (Monitoring)

अंतिम चरण में उन लोगों की लंबे समय तक निगरानी रखने का प्रावधान किया गया है, जो डी-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रम से गुजर चुके हैं, ताकि वे दोबारा कट्टरपंथ की ओर न लौटें।

इसके अलावा SOP के तहत जिला स्तर की Anti-Radicalisation Cell (ARC) के लिए नियमित मासिक रिपोर्टिंग व्यवस्था भी लागू की गई है।

अब बात करते हैं कि इस SOP पर विवाद क्यों हुआ।

The Wire ने इस SOP पर एक लेख प्रकाशित करते हुए दावा किया कि इसमें बताए गए कुछ संकेत—जैसे दाढ़ी रखना, नकाब पहनना, अरबी शब्दों का अधिक इस्तेमाल करना या एतिकाफ (Itikaf) जैसी धार्मिक प्रथाओं का पालन करना – आम मुसलमानों को भी संदेह के दायरे में ला सकते हैं। लेख में आशंका जताई गई कि इससे धार्मिक पहचान और कट्टरपंथ के बीच भ्रम पैदा हो सकता है।

दूसरी ओर, इस SOP का समर्थन करने वालों का कहना है कि दस्तावेज़ में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि किसी धर्म विशेष के सभी लोगों को संदेह की नजर से देखा जाए। उनका तर्क है कि SOP का उद्देश्य केवल उन मामलों की पहचान करना है, जहां किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक ऐसे बदलाव दिखाई दें जो कट्टरपंथ की ओर बढ़ने का संकेत हो सकते हैं, और ऐसे लोगों को समय रहते मुख्यधारा में वापस लाने की कोशिश की जाए।

यही वजह है कि इस SOP को लेकर बहस केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रही, बल्कि नागरिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दों तक पहुंच गई है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या गुजरात सरकार का यह मॉडल कट्टरपंथ रोकने में प्रभावी साबित होगा, या फिर आलोचकों की आशंकाओं के अनुसार इससे धार्मिक प्रोफाइलिंग का खतरा बढ़ेगा? इसका जवाब आने वाले समय में इस SOP के क्रियान्वयन और उसके परिणामों से ही मिलेगा।

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