राजनीति छोड़ना चाहते थे योगी आदित्यनाथ! गुरु की एक सीख ने बदल दी पूरी जिंदगी
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज देश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि राजनीति में आने के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने इसे हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला कर लिया था। संसद पहुंचने के बाद वे इतने निराश हो गए थे कि अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ के पास लौटकर उन्होंने राजनीति छोड़ने की इच्छा जाहिर कर दी थी। हालांकि, गुरु की एक सीख ने उनकी सोच बदल दी और वही पल उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
26 साल की उम्र में बने थे देश के सबसे युवा सांसदों में से एक
योगी आदित्यनाथ का जन्म 5 जून 1972 को उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) के पौड़ी गढ़वाल जिले में हुआ था। उनका मूल नाम अजय सिंह बिष्ट था। गोरखनाथ मठ से जुड़ने के बाद उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और महंत अवैद्यनाथ के शिष्य बने। साल 1998 में महंत अवैद्यनाथ ने उन्हें गोरखपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया। महज 26 वर्ष की आयु में जीत दर्ज कर योगी आदित्यनाथ उस समय देश के सबसे युवा सांसदों में शामिल हो गए। भगवा वस्त्रों में संसद पहुंचे इस युवा संन्यासी ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा।
दिल्ली की राजनीति देखकर हो गए थे निराश
लोकसभा पहुंचने के कुछ ही महीनों बाद योगी आदित्यनाथ का सामना राष्ट्रीय राजनीति की वास्तविकताओं से हुआ। विभिन्न साक्षात्कारों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्होंने बताया है कि संसद और राजनीति के शुरुआती अनुभव उनके लिए बेहद कठिन रहे। उन्हें लगा कि राजनीति में सिद्धांतों से ज्यादा समझौते, आरोप-प्रत्यारोप और सत्ता की होड़ दिखाई देती है। गोरखनाथ मठ के अनुशासित वातावरण में पले-बढ़े योगी के लिए यह माहौल असहज था। वे गोरखपुर लौटे और अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ से कहा कि राजनीति उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं है। उन्होंने इच्छा जताई कि वे सार्वजनिक जीवन छोड़कर फिर से मंदिर की सेवा करना चाहते हैं।
गुरु की एक सीख ने बदल दी दिशा
योगी आदित्यनाथ की बात सुनने के बाद महंत अवैद्यनाथ ने उन्हें राजनीति छोड़ने से रोक दिया। उन्होंने कहा कि “यदि अच्छे लोग राजनीति छोड़ देंगे, तो व्यवस्था को कौन बदलेगा?” गुरु ने समझाया कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का भी एक प्रभावी रास्ता है। उन्होंने योगी से कहा कि कठिनाइयों से भागने के बजाय व्यवस्था के भीतर रहकर बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिए। यही सलाह योगी आदित्यनाथ के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ बन गई।
संघर्षों के बीच तय किया लंबा सफर
गुरु की सीख के बाद योगी आदित्यनाथ ने राजनीति में बने रहने का फैसला किया। इसके बाद उनका सफर आसान नहीं रहा। 1999 के लोकसभा चुनाव में उन्हें कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा, लेकिन वे दोबारा जीतकर संसद पहुंचे। बाद के वर्षों में उन्होंने लगातार गोरखपुर का प्रतिनिधित्व किया और क्षेत्र में अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई। साल 2007 में एक आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार भी किया गया और कुछ दिनों तक जेल में रहना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपने राजनीतिक सफर को जारी रखा।
आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं योगी आदित्यनाथ
साल 2017 में भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक जीत दर्ज की और योगी आदित्यनाथ को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद 2022 में वे लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने, जो उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। योगी आदित्यनाथ अक्सर कहते हैं कि वे स्वयं को पहले एक संन्यासी और उसके बाद एक राजनेता मानते हैं। राजनीति में बने रहने का उनका निर्णय व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ की उस सीख से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने सेवा, अनुशासन और समाज के प्रति जिम्मेदारी को सबसे ऊपर रखा। यही कारण है कि राजनीति छोड़ने का विचार रखने वाला एक युवा संन्यासी आज देश के सबसे चर्चित मुख्यमंत्रियों में गिना जाता है।
