परिवारवाद की बलि चढ़ी TMC? अपनों की बगावत और ‘भतीजा-मोह’ में फंसी ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा ऐतिहासिक भूचाल आ चुका है, जिसकी कल्पना शायद खुद तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कभी नहीं की होगी। जो ममता बनर्जी कभी पूरे देश की राजनीति में हुंकार भरती थीं, आज वो अपने ही राजनीतिक गढ़ में पूरी तरह लाचार नजर आ रही हैं। हालत यह हो चुकी है कि ममता बनर्जी को आज अपनी ही बनाई पार्टी को बिखरने से बचाने के लिए अपने ही नेताओं के सामने हाथ फैलाना पड़ रहा है। सत्ता के अहंकार और अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के प्रति अंधे मोह ने आज ममता बनर्जी को ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां न सिर्फ उनकी पार्टी का अस्तित्व दांव पर है, बल्कि अब उनके अपने कुनबे को बचाने का भी संकट खड़ा हो गया है।
बागी गुट की दो टूक शर्त: ‘भतीजे को बाहर करो, तभी बचेगी पार्टी’
यह बगावत कोई साधारण राजनीतिक असंतोष नहीं है। यह तृणमूल कांग्रेस के भीतर लंबे समय से सुलग रही वो आग है, जो अब ममता के राजनीतिक साम्राज्य को राख करने पर आमादा है। नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने ममता बनर्जी के सामने एक ऐसी शर्त रख दी है, जिसने नेतृत्व की रातों की नींद हराम कर दी है। बागियों का साफ कहना है कि यदि पार्टी को बचाना है और कोई बातचीत आगे बढ़ानी है, तो ममता बनर्जी को सबसे पहले अपने भतीजे और टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी को बाहर का रास्ता दिखाना होगा।
ममता बनर्जी के सबसे करीबी और पुराने साथियों में शुमार रहे वरिष्ठ नेता रवींद्रनाथ घोष ने भी अब खुलकर बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है। बागी गुट में शामिल होने के बाद घोष ने दावा किया कि यदि ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को सक्रिय राजनीति से पूरी तरह अलग करने का फैसला करती हैं, तो ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट में गए अधिकांश नाराज नेता वापस पार्टी के साथ आ सकते हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि—क्या ममता बनर्जी इस ‘भतीजा-मोह’ से ऊपर उठ पाएंगी?
ममता के मुंह पर करारा तमाचा है रवींद्रनाथ घोष का बागी होना
रवींद्रनाथ घोष का बागी खेमे में जाना ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। घोष को ममता का बेहद वफादार और भरोसेमंद नेता माना जाता था। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट से हाथ मिलाकर उन्होंने ममता बनर्जी से अपने सारे पुराने रिश्ते तोड़ लिए हैं। पार्टी के भीतर की यह दरार अब इतनी चौड़ी हो चुकी है कि टीएमसी का विभाजन अब लगभग तय माना जा रहा है।
उधर, इस पूरे विवाद को लेकर जनता का मूड भी सामने आ चुका है। हाल ही में एक न्यूज़ चैनल द्वारा कराए गए ओपिनियन पोल में जनता से सीधे सवाल पूछे गए थे कि—”क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी बचाने के लिए अपने सगे भतीजे (अभिषेक बनर्जी) के खिलाफ कोई कड़ा फैसला लेंगी?” इसके जवाब चौंकाने वाले रहे। पोल में हिस्सा लेने वाले 78 फीसदी लोगों का मानना है कि ममता दीदी अपने भतीजे के खिलाफ कभी कोई कड़ा कदम नहीं उठाएंगी, जबकि महज 19 फीसदी लोगों को लगता है कि पार्टी बचाने के लिए ममता ऐसा कर सकती हैं। यह आंकड़ा साफ बयां करता है कि जनता की नजर में पार्टी पर परिवारवाद हावी हो चुका है।
ममता बनाती रहीं रणनीति, बागियों ने खड़ी कर दी समानांतर ‘TMC’
एक तरफ ममता बनर्जी अपने दफ्तर में बैठकर डैमेज कंट्रोल की रणनीतियां बनाने में जुटी हैं, तो दूसरी तरफ बागी गुट ने बेहद आक्रामक तरीके से पूरी पार्टी को अपने नियंत्रण में लेने की तैयारी कर ली है। बागियों ने ममता बनर्जी की आधिकारिक समितियों के समानांतर अपनी अलग राज्य और जिला समितियां खड़ी कर दी हैं, जो ममता की राजनीतिक सत्ता को सीधी और खुली चुनौती है।
इस बगावत का असर यह हुआ कि बीरभूम के कद्दावर नेता अनुब्रत मंडल समेत कई पुराने वफादार नेता, जो कभी ममता बनर्जी की रीढ़ की हड्डी माने जाते थे, आज बागी खेमे के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं।
‘I-PAC’ और अभिषेक की वजह से डूबी टीएमसी की लुटिया: घोष
बागी नेता रवींद्रनाथ घोष ने पाला बदलने के साथ ही अभिषेक बनर्जी और उनकी पॉलिटिकल कंसल्टेंसी कंपनी आई-पैस (I-PAC) को टीएमसी की बर्बादी का मुख्य जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को जो करारी हार का सामना करना पड़ा, उसकी सबसे बड़ी वजह आई-पैस ही थी। घोष के मुताबिक, “इस कंपनी ने जमीन से जुड़े असली नेताओं को किनारे कर दिया, रात-दिन मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं का अपमान किया और पूरी राजनीतिक पार्टी को एक कॉरपोरेट ‘प्राइवेट लिमिटेड कंपनी’ की तरह चलाया। इसी घमंड का नतीजा है कि टीएमसी सत्ता से बाहर हो गई।”
क्या इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी ममता की विरासत?
जो ममता बनर्जी कभी केंद्र की सरकारों को हिलाने का माद्दा रखती थीं, आज वह अपने ही घर में लगी आग को बुझाने में पूरी तरह बेबस नजर आ रही हैं। भतीजे अभिषेक बनर्जी का कथित घमंड और ममता बनर्जी का अंधा मोह आज टीएमसी के पतन की सबसे बड़ी पटकथा लिख रहा है। अब ममता बनर्जी के पास केवल दो ही रास्ते बचे हैं—या तो वे अपने भतीजे का मोह त्यागकर वरिष्ठ नेताओं की बात सुनें और पार्टी को बचाएं, या फिर इस परिवारवाद की वेदी पर अपनी जीवनभर की राजनीतिक विरासत को जलते हुए देखें।
