तीर-कमान लेकर जंगल माफिया से भिड़ गईं, बचा लिए हजारों पेड़; मिला पद्मश्री सम्मान

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जंगलों की रक्षा की बात अक्सर सरकारी योजनाओं और बड़े अभियानों में सुनने को मिलती है, लेकिन झारखंड की एक साधारण महिला ने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो अकेला इंसान भी बड़ा बदलाव ला सकता है। हम बात कर रहे हैं जमुना टुडू की, जिन्हें आज पूरा देश “लेडी टार्जन” के नाम से जानता है। उन्होंने न केवल जंगल माफिया का डटकर सामना किया, बल्कि हजारों एकड़ जंगल को कटने से बचाकर पर्यावरण संरक्षण की एक अनोखी मिसाल भी पेश की।

शादी के बाद देखा उजड़ता हुआ जंगल

जमुना टुडू का जीवन संघर्षों से भरा रहा। साल 1998 में शादी के बाद वह झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के मुतूरखाम गांव पहुंचीं। गांव के आसपास फैले घने जंगल वहां के लोगों की आजीविका और पहचान थे, लेकिन उस समय लकड़ी माफिया लगातार पेड़ों की अवैध कटाई कर रहे थे। स्थानीय लोगों में इतना डर था कि कोई भी उनके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करता था। जमुना ने देखा कि यदि यही हाल रहा, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगल केवल कहानियों में रह जाएंगे। उन्होंने तय किया कि अब चुप नहीं बैठेंगी।

महिलाओं की बनाई ‘ग्रीन आर्मी’

जब गांव के कई पुरुष माफियाओं के डर से पीछे हट गए, तब जमुना टुडू ने महिलाओं को संगठित करने का फैसला किया। उन्होंने गांव की महिलाओं को एकजुट कर एक महिला सुरक्षा दल बनाया, जिसे लोग बाद में ‘ग्रीन आर्मी’ के नाम से पहचानने लगे। महिलाएं हाथों में तीर-कमान और लाठियां लेकर जंगल की निगरानी करने लगीं। वे दिन-रात गश्त करती थीं और जैसे ही अवैध कटाई की सूचना मिलती, तुरंत मौके पर पहुंच जातीं। धीरे-धीरे आसपास के कई गांव भी इस अभियान से जुड़ते गए और यह एक जन आंदोलन बन गया।

जान से मारने की धमकियां भी नहीं डिगा सकीं

जंगल माफिया ने जमुना टुडू को कई बार धमकाया। उन पर हमले करने की कोशिश की गई और उन्हें जान से मारने तक की धमकियां मिलीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। जमुना का मानना था कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि गांव की जीवनरेखा हैं। उन्होंने लोगों को पर्यावरण के महत्व के बारे में जागरूक किया और जंगल बचाने को सामाजिक जिम्मेदारी बना दिया।

पेड़ों को बांधी राखी, संरक्षण को बनाया परंपरा

जमुना टुडू ने पर्यावरण संरक्षण को लोगों की भावनाओं से जोड़ने का अनोखा तरीका अपनाया। उन्होंने गांव की महिलाओं और बच्चों के साथ मिलकर पेड़ों को राखी बांधने की परंपरा शुरू की। संदेश साफ था जिस तरह भाई की रक्षा की जाती है, उसी तरह पेड़ों की भी रक्षा करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है। आज यह पहल केवल उनके गांव तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण का प्रेरणादायक उदाहरण बन चुकी है।

हजारों हेक्टेयर जंगल बचाने पर मिला पद्मश्री

लगातार दो दशकों से अधिक समय तक चलाए गए इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि जहां कभी जंगल तेजी से खत्म हो रहे थे, वहीं आज वहां हरियाली लौट आई है। जमुना टुडू और उनके साथियों ने हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र को अवैध कटाई से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पर्यावरण संरक्षण में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2019 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। आज जमुना टुडू केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनकी कहानी यह साबित करती है कि बदलाव लाने के लिए बड़े पद या बड़ी ताकत नहीं, बल्कि मजबूत इरादों की जरूरत होती है।

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