जिस शख्स ने इंदिरा गांधी के सामने झुकने से कर दिया था इनकार, वही बने भारतीय पत्रकारिता के सबसे बड़े प्रतीक

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भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में जब भी सत्ता से टकराने का जिक्र होगा, तो रामनाथ गोयनका का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। वह व्यक्ति, जिसने देश में 1975 की इमरजेंसी के दौरान प्रेस पर लगाए गए सरकारी प्रतिबंधों के सामने झुकने से साफ इनकार कर दिया। जब अधिकांश अखबार सरकारी सेंसरशिप के दबाव में खामोश हो चुके थे, तब द इंडियन एक्सप्रेस लोकतंत्र की सबसे बुलंद आवाज बनकर सामने आया। यही कारण है कि आज भी रामनाथ गोयनका को भारतीय पत्रकारिता की आज़ादी का सबसे बड़ा प्रहरी माना जाता है।

दरभंगा से शुरू हुआ एक ऐतिहासिक सफर

रामनाथ गोयनका का जन्म 3 अप्रैल 1904 को बिहार के दरभंगा में एक मारवाड़ी व्यवसायी परिवार में हुआ था। परिवार चाहता था कि वे कारोबार संभालें, लेकिन उनकी रुचि व्यापार से कहीं अधिक पत्रकारिता में थी। युवावस्था में उन्हें दक्षिण भारत भेजा गया, जहां उन्होंने समाचार पत्रों के कामकाज को करीब से समझा। कुछ ही वर्षों में उन्होंने मीडिया की ताकत को पहचान लिया और पत्रकारिता को ही अपना जीवन बना लिया। साल 1935-36 के दौरान उन्होंने आर्थिक संकट से जूझ रहे द इंडियन एक्सप्रेस की कमान अपने हाथों में ली। इसके बाद उन्होंने लगातार विस्तार करते हुए इस अखबार को देश के सबसे प्रभावशाली मीडिया समूहों में बदल दिया। आने वाले दशकों में इंडियन एक्सप्रेस के 14 से अधिक संस्करण और कई भारतीय भाषाओं में प्रकाशन शुरू हुए। गोयनका ने यह साबित कर दिया कि अखबार केवल खबरें छापने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सबसे मजबूत आवाज भी हो सकता है।

जब इमरजेंसी ने लोकतंत्र की परीक्षा ली

25 जून 1975 की रात देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई। सरकार ने प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लगा दी। अखबारों को आदेश दिया गया कि कोई भी खबर प्रकाशित करने से पहले सरकारी अधिकारियों की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इस माहौल में अधिकांश मीडिया संस्थानों ने दबाव के आगे समझौता कर लिया। लेकिन रामनाथ गोयनका ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया। इमरजेंसी लागू होने के तुरंत बाद द इंडियन एक्सप्रेस ने अपना संपादकीय पृष्ठ (Editorial Page) पूरी तरह खाली प्रकाशित किया। उस खाली पन्ने पर एक भी शब्द नहीं था, लेकिन उसका संदेश पूरे देश ने समझ लिया। वह मौन विरोध यह बता रहा था कि भारत में प्रेस की आज़ादी पर हमला हो चुका है। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में इसे आज भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे साहसी प्रतीकों में गिना जाता है।

सत्ता से सवाल पूछना ही उनका सिद्धांत था

रामनाथ गोयनका का मानना था कि पत्रकारिता का पहला कर्तव्य सरकार की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि जनता के हित में सत्ता से सवाल पूछना है। उन्होंने ब्रिटिश शासन के समय भी निर्भीक पत्रकारिता की और आज़ादी के बाद भी किसी भी सरकार के सामने झुकने से इनकार किया। उनके लिए अखबार एक व्यवसाय नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का माध्यम था। यही वजह थी कि आर्थिक नुकसान, राजनीतिक दबाव और सरकारी कार्रवाई के बावजूद उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

आज भी उनके नाम पर दिया जाता है देश का सबसे बड़ा पत्रकारिता सम्मान

5 अक्टूबर 1991 को रामनाथ गोयनका का निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी भारतीय पत्रकारिता को प्रेरित करती है। उनके सम्मान में हर वर्ष ‘रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवार्ड’ दिया जाता है, जिसे देश के सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारिता सम्मानों में गिना जाता है। यह पुरस्कार उन पत्रकारों को दिया जाता है, जिन्होंने निष्पक्ष, निर्भीक और जनहित की पत्रकारिता की मिसाल पेश की हो। रामनाथ गोयनका की कहानी हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता, बल्कि उन पत्रकारों से भी मजबूत होता है जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखते हैं। जब इतिहास भारतीय प्रेस की सबसे साहसी आवाजों को याद करेगा, तब रामनाथ गोयनका का नाम हमेशा सबसे आगे लिखा जाएगा।

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