कर्नाटक में सीएम बदला, लेकिन कांग्रेस का नाटक नहीं, मनमाना मंत्रालय नहीं मिला तो दे दिया इस्तीफा
रामलिंगा रेड्डी की तस्वीर
कर्नाटक की राजनीति इन दिनों राजनीति कम और नाटक ज्यादा लग रही है। पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर पिछले एक साल से कांग्रेस के भीतर खींचतान चलती रही। फिर जैसे-तैसे डी.के. शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली, लेकिन अब मंत्रियों के बीच मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।
जिस डी.के. शिवकुमार को कांग्रेस का संकटमोचक बताया जा रहा था, उन्हें मुख्यमंत्री तो बना दिया गया, लेकिन लगता है कि कांग्रेस हाईकमान यह भूल गया कि सिर्फ़ कुर्सी देने से सरकार नहीं चलती। सरकार चलाने के लिए मंत्रियों और विधायकों को भी साथ लेकर चलना पड़ता है।
मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने खोला मोर्चा
डी.के. शिवकुमार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के महज़ एक दिन बाद ही उनकी सरकार के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा। राज्य सरकार के वरिष्ठ मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने कैबिनेट से इस्तीफ़ा दे दी।
शुक्रवार (5 जून 2026) को बेंगलुरु में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रेड्डी ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार पर सीधे आरोप लगाए। रेड्डी का दावा है कि डी.के. शिवकुमार स्वयं उनके घर आए थे और उन्होंने आश्वासन दिया था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद वे बेंगलुरु डेवलपमेंट मंत्रालय छोड़ देंगे और यह विभाग रामलिंगा रेड्डी को सौंप दिया जाएगा।
रेड्डी ने यह भी कहा कि शपथ ग्रहण से एक दिन पहले जब उनकी मुलाकात डी.के. शिवकुमार से हुई थी, तब भी उन्हें यही भरोसा दिया गया था कि वही इस विभाग को संभालेंगे।
वादा कुछ और, मिला कुछ और
रामलिंगा रेड्डी के अनुसार उन्होंने कभी खुद जाकर बेंगलुरु डेवलपमेंट मंत्रालय की मांग नहीं की थी। बल्कि उन्हें यह विभाग ऑफर किया गया था।
लेकिन जब नई कैबिनेट में मंत्रालयों का बंटवारा हुआ तो रेड्डी को मेजर एंड मीडियम इरिगेशन विभाग दे दिया गया, जबकि बेंगलुरु डेवलपमेंट मंत्रालय कृष्ण बायरगौड़ा को सौंप दिया गया।
यहीं से विवाद शुरू हो गया। एक मंत्रालय को लेकर मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई और वह भी सरकार के गठन के महज़ एक दिन बाद।
मोदी का पुराना तंज फिर हुआ प्रासंगिक?
इस पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह बयान याद आता है, जो उन्होंने 10 मई को बेंगलुरु में दिया था। केरल में मुख्यमंत्री चयन को लेकर कांग्रेस पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा था—
“ऐसा कर लीजिए, 5 सीएम को 1-1 साल के लिए बना दीजिए।”
उस समय यह बयान केरल की राजनीति पर था, लेकिन आज कर्नाटक की स्थिति को देखकर यह तंज वहीं अधिक फिट बैठता दिखाई देता है।
कांग्रेस हाईकमान के आदेश पर मुख्यमंत्री तो तय कर दिया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या वही हाईकमान एक ऐसी व्यवस्था तैयार कर पाया है, जो सरकार को स्थिरता से चला सके?
आखिर बेंगलुरु डेवलपमेंट मंत्रालय में ऐसा क्या है?
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर बेंगलुरु डेवलपमेंट मंत्रालय में ऐसा क्या है, जिसे लेकर इतना विवाद खड़ा हो गया?
अगर मान लिया जाए कि रामलिंगा रेड्डी जनता की सेवा करना चाहते हैं, तो वह किसी भी मंत्रालय के माध्यम से कर सकते हैं। फिर आखिर ऐसा क्या कारण है कि हर नेता इसी विभाग को अपने पास रखना चाहता है?
दिलचस्प बात यह है कि सिद्धारमैया सरकार के दौरान यही मंत्रालय डी.के. शिवकुमार के पास था। अब जब यह विभाग किसी और को दे दिया गया है, तो असंतोष सामने आ गया।
ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि इस मंत्रालय की अहमियत सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक भी है।
कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी?
सूत्रों के मुताबिक मंत्रालयों के बंटवारे से सिर्फ रामलिंगा रेड्डी ही नाराज़ नहीं हैं। कुछ अन्य मंत्री और विधायक भी अपने हिस्से से संतुष्ट नहीं बताए जा रहे हैं।
अगर यह असंतोष बढ़ता है, तो कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। जिस तरह पश्चिम बंगाल में राजनीतिक उठापटक और दलों के भीतर असंतोष ने बड़े बदलावों को जन्म दिया था, उसी तरह कर्नाटक कांग्रेस को भी अपने घर के भीतर बढ़ती नाराज़गी पर नज़र रखनी होगी।
डी.के. शिवकुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली है, लेकिन ऐसा लगता है कि असली परीक्षा अब शुरू हुई है। मुख्यमंत्री बनने के साथ ही उनके सामने पहला संकट उनकी ही कैबिनेट से खड़ा हो गया है।
