UP Election 2027: अखिलेश यादव का ‘मिशन क्लीन-अप’ और इस्तीफों की झड़ी, क्या योगी मॉडल को दे पाएंगे टक्कर?
लखनऊ: उत्तर प्रदेश—देश का सबसे बड़ा राज्य और भारत की सियासत का वो अभेद्य किला, जिसे फतह किए बिना दिल्ली की सत्ता का रास्ता तय करना नामुमकिन माना जाता है। साल 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों की आहट अभी से तेज हो गई है। राज्य के राजनीतिक गलियारों में इस वक्त सिर्फ एक ही यक्ष प्रश्न तैर रहा है—क्या मोदी-योगी की जुगलबंदी को कोई हिला पाएगा? समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव इस जोड़ी को कड़ी टक्कर देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। लेकिन, चुनावी बिसात पर कोई भी बड़ा मोहरा आगे बढ़ाने से पहले ही समाजवादी पार्टी के भीतर अंदरूनी भूचाल आ गया है।
पार्टी के भीतर कड़े फैसलों और संगठनात्मक बदलावों के बीच इस्तीफों की भरमार लग गई है। वहीं, रणनीति के स्तर पर अखिलेश यादव ने एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए चुनावी मैनेजमेंट संभालने वाली मशहूर संस्था ‘I-PAC’ की छुट्टी कर दी है। यह वही आई-पैक है जो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के चुनावी अभियान का हिस्सा रही थी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अखिलेश यादव के ये कड़े और नए प्रयोग उन्हें यूपी की सत्ता में वापस ला पाएंगे, या फिर उनके सारे अरमान धरे के धरे रह जाएंगे?
‘I-PAC’ को बाय-बाय !
2027 के महामुकाबले को देखते हुए उत्तर प्रदेश में सभी राजनीतिक दलों ने अपनी समीक्षा बैठकें और जमीनी तैयारियां तेज कर दी हैं। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) बूथ स्तर पर अपनी किलाबंदी को और मजबूत करने में जुट गई है, वहीं मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने भी अपने संगठन में ‘मिशन क्लीन-अप’ शुरू किया है। इस मिशन के तहत अखिलेश यादव ने सबसे पहला बड़ा फैसला आई-पैक (I-PAC) जैसी बाहरी एजेंसी से दूरी बनाकर लिया है।
दरअसल, सपा अध्यक्ष इस बार टिकट बंटवारे में किसी भी तरह की चूक नहीं चाहते। 2027 के लिए संभावित और जिताऊ उम्मीदवारों की सही पहचान करने के लिए उन्होंने एक व्यापक अंदरूनी अभियान शुरू किया है। इसके लिए रिटायर्ड आईएएस (IAS) अधिकारी आलोक रंजन की अगुवाई में एक विशेष निगरानी टीम का गठन किया गया है। यह टीम स्वतंत्र एजेंसियों के माध्यम से जमीनी सर्वे करवा रही है और राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों पर दावेदारों को लेकर ब्लॉक और बूथ स्तर तक का फीडबैक ले रही है, ताकि केवल सबसे मजबूत चेहरों को ही मैदान में उतारा जा सके।
सपा में मची ‘इस्तीफों की होड़’
इस पूरी कवायद के बीच अखिलेश यादव ने एक ऐसा संगठनात्मक नियम लागू कर दिया है, जिसने पार्टी के भीतर खलबली मचा दी है। उन्होंने स्पष्ट निर्देश जारी किया है कि संगठन का जो भी पदाधिकारी या नेता आगामी विधानसभा चुनाव लड़ना चाहता है, उसे टिकट की दावेदारी पेश करने से पहले अपने वर्तमान संगठनात्मक पद से इस्तीफा देना होगा।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि इस फैसले के आते ही समाजवादी पार्टी में ताबड़तोड़ इस्तीफों का दौर शुरू हो गया है। जो नेता अब तक संगठन में मलाईदार पदों पर थे, वे चुनाव लड़ने की चाह में अपने पद छोड़ रहे हैं। इस कदम से एक तरफ जहां टिकट मांगने वालों की लंबी कतार लग गई है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के भीतर आंतरिक गुटबाजी और असंतोष उभरने का खतरा भी बढ़ गया है।
‘योगी मॉडल’ बनाम अखिलेश का चक्रव्यूह
उत्तर प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर को देखें तो मुकाबला बेहद दिलचस्प है। एक तरफ बीजेपी का ‘योगी मॉडल’ है, जो बिना किसी लाग-लपेट के सीधे तौर पर सख्त कानून-व्यवस्था और एक्सप्रेसवे-इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विकास कार्यों को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाता है। बीजेपी का सांगठनिक ढांचा बूथ स्तर पर बेहद चुस्त है, जिसके पास केंद्र में ‘मोदी का चेहरा’ और राज्य में ‘योगी का गवर्नेंस मॉडल’ है।
इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी के सामने अपनी पुरानी छवि को बदलने की सबसे बड़ी चुनौती है। यूपी की आम जनता के एक बड़े हिस्से के मन में सपा की छवि अब भी कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर ढीली, परिवारवाद और अत्यधिक जातीय समीकरणों में उलझी हुई पार्टी के रूप में दर्ज है। अखिलेश यादव के लिए इस परसेप्शन (छवि) को तोड़ना ही उनका सबसे बड़ा कांटा बना हुआ है।
क्या ‘MY’ समीकरण से बाहर निकल पाएगी सपा?
अखिलेश यादव भले ही इस बार टिकट वितरण में नए सिरे से जातीय गणित बिठाने और स्थानीय स्तर पर उम्मीदवारों की साख को तौलने में लगे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्या 2027 के बदलते उत्तर प्रदेश में सिर्फ पारंपरिक फॉर्मूला काम कर पाएगा? आज की जनता सिर्फ जातिगत गोलबंदी नहीं, बल्कि सुरक्षा, रोजगार और विकास का ठोस रोडमैप (योगी मॉडल) देख रही है। सपा को अगर सत्ता की दहलीज तक पहुंचना है, तो उसे अपने पारंपरिक ‘मुस्लिम-यादव’ (M-Y) समीकरण के खोल से बाहर निकलकर सर्वसमाज के बीच विकास के नाम पर अपना नया आधार बनाना होगा।
फिलहाल के राजनीतिक हालातों को देखकर साफ है कि अखिलेश यादव की राह कांटों भरी है। वे एक ऐसे चक्रव्यूह में घिरे हैं जहां उन्हें अपनी ही पार्टी के भीतर टिकटार्थियों को संतुष्ट रखना है और बाहर बीजेपी जैसी मजबूत चुनावी मशीनरी से मुकाबला करना है। योगी आदित्यनाथ के अभेद्य नजर आ रहे सियासी किले के सामने अखिलेश का यह ‘क्लीन-अप’ मिशन कितना कारगर साबित होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि यूपी का 2027 का चुनाव देश का सबसे बड़ा ‘हाई-वोल्टेज’ राजनीतिक ड्रामा होने जा रहा है।
