यूपी चुनाव से पहले ‘दो लड़कों’ में रार: सीट शेयरिंग पर सपा-कांग्रेस में बढ़ा तनाव, क्या बिखर जाएगा गठबंधन?
UP Assembly Polls: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बिगुल बजने में अभी भले ही समय हो, लेकिन सूबे की सियासत में अभी से भारी उबाल आ चुका है। ‘इंडिया’ गठबंधन के दो प्रमुख घटक दलों, समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर तलवारें खिंच गई हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि यदि दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व में जल्द ही आम सहमति नहीं बनी, तो उत्तर प्रदेश में विपक्षी एकजुटता का यह किला ढह सकता है।
गठबंधन में ‘महायुद्ध’
उत्तर प्रदेश में चुनावी बिसात बिछने में अब लगभग 6 महीने का वक्त शेष है। एक तरफ जहां दोनों दल उत्तर प्रदेश की सत्ता से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को बेदखल करने का दम भर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गठबंधन के भीतर ही एक आंतरिक ‘महायुद्ध’ शुरू हो चुका है। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी सपा के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरने के पक्षधर हैं, लेकिन सपा मुखिया अखिलेश यादव कांग्रेस की उम्मीदों और शर्तों के आगे झुकने को कतई तैयार नहीं हैं।
अखिलेश का ‘प्लान-बी’ तैयार
सपा के अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अखिलेश यादव ने अपने सभी जिला अध्यक्षों, सांसदों और मौजूदा विधायकों से जमीनी हकीकत का फीडबैक मांगा है। वे यह आकलन कर रहे हैं कि राज्य में ऐसी कौन सी सीटें हैं जहां कांग्रेस का थोड़ा-बहुत वजूद या संगठनात्मक पकड़ बची है।
सपा फिलहाल कांग्रेस को 60 से 80 सीटें देने का मन बना रही है। हालांकि, अखिलेश यादव राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं; इसलिए बातचीत के बीच उन्होंने सपा संगठन को राज्य की सभी 403 विधानसभा सीटों पर संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार करने का भी निर्देश दे दिया है। साफ है कि अखिलेश को गठबंधन टूटने का अंदेशा पहले से है और वे किसी भी परिस्थिति में ‘प्लान-बी’ के साथ अकेले मैदान में उतरने से पीछे नहीं हटेंगे।
कांग्रेस की नाराजगी
दूसरी ओर, कांग्रेस का प्रदेश संगठन सपा के इस रवैए और बेहद कम सीटों के प्रस्ताव से खासा नाराज है। कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि इतनी कम सीटों पर चुनाव लड़ना पार्टी के आत्मसम्मान और कार्यकर्ताओं के मनोबल से समझौता करने जैसा होगा। शुरुआती दौर की बातचीत में कांग्रेस की ओर से कम से कम 120 सीटों की मांग रखने की तैयारी है।
सीटों के इस गणित के अलावा, कांग्रेस के भीतर एक बड़ा रणनीतिक डर भी घर कर रहा है। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि समाजवादी पार्टी की ‘बाहुबल और माफिया’ वाली पुरानी छवि चुनाव में कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है। कांग्रेस के रणनीतिकार इस बात से वाकिफ हैं कि बीजेपी पूरे चुनाव अभियान के दौरान सपा को ‘लॉ एंड ऑर्डर’ (कानून व्यवस्था) के मुद्दे पर घेरेगी। ऐसे में कांग्रेस नेताओं को डर है कि सपा के साथ मंच साझा करने पर वे जनता के बीच बीजेपी के इस आक्रामक नैरेटिव को डिफेंड नहीं कर पाएंगे और खुद बैकफुट पर आ जाएंगे।
दावों और तर्कों की जंग
इस सियासी घमासान में दोनों ही दलों के पास अपने-अपने मजबूत तर्क हैं:
- समाजवादी पार्टी का रुख: सपा नेताओं का सीधा आरोप है कि उत्तर प्रदेश की जमीन पर कांग्रेस का कोई मजबूत सांगठनिक ढांचा नहीं बचा है। पार्टी के पास न तो बूथ स्तर पर कार्यकर्ता हैं और न ही हर जिले में कद्दावर चेहरे। ऐसे में कांग्रेस को ज्यादा सीटें सौंपना, सीधे तौर पर बीजेपी को ‘वॉकओवर’ देने जैसा होगा।
- कांग्रेस का पलटवार: कांग्रेस इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है। पार्टी का दावा है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में गठबंधन को जो अप्रत्याशित सफलता मिली थी, उसके पीछे कांग्रेस का वोट बैंक ट्रांसफर होना और राहुल गांधी की देशव्यापी छवि एक मुख्य वजह थी। कांग्रेस का मानना है कि राज्य में उनका ग्राफ लगातार बढ़ रहा है, इसलिए उन्हें छोटा पार्टनर आंकना सपा की बड़ी भूल होगी।
अतीत का सबक
यह पहली बार नहीं है जब इन दोनों दलों के रिश्तों में ऐसी तल्खी देखने को मिल रही है। इससे पहले साल 2023 के राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान भी दोनों तरफ से तीखी बयानबाजी हुई थी, जिसके बाद राहुल गांधी और अखिलेश यादव के सीधे हस्तक्षेप के बाद ही लोकसभा चुनाव के लिए समझौता मुमकिन हो सका था।
राजनीतिक पंडितों का विश्लेषण है कि सपा और कांग्रेस का गठबंधन कोई ‘नेचुरल अलायंस’ (प्राकृतिक गठबंधन) नहीं है, क्योंकि दोनों दलों की मूल विचारधारा और वोट बैंक की जमीन अलग है। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी यह गठबंधन बनता है, यह विपक्षी वोटों का बिखराव तो कुछ हद तक रोक लेता है, लेकिन सीटों की संख्या में तब्दील नहीं हो पाता।
विशेषज्ञ इसके लिए बिहार विधानसभा चुनाव का उदाहरण देते हैं, जहां आरजेडी के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने ज्यादा सीटों की मांग तो पूरी करवा ली थी, लेकिन जमीन पर खराब प्रदर्शन के चलते वह महज 5 सीटों पर सिमट गई। इसका खामियाजा पूरे गठबंधन को भुगतना पड़ा और वे सत्ता से दूर रह गए। सपा को डर है कि यूपी में कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने पर कहीं बिहार जैसा हश्र न हो जाए।
बीजेपी की नजर और दिलचस्प होता मुकाबला
फिलहाल गेंद पूरी तरह से कांग्रेस आलाकमान और राहुल गांधी के पाले में है। राहुल गांधी को अब यह तय करना है कि क्या वे अखिलेश यादव के दबाव के आगे झुककर कम सीटों पर ही संतोष करेंगे, या फिर प्रदेश संगठन की मांग पर उत्तर प्रदेश में ‘एकला चलो’ की राह पकड़ेंगे।
इस पूरी खींचतान के बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) बेहद शांत और सतर्क नजर आ रही है। बीजेपी विपक्ष के इस आंतरिक अंतर्विरोध और बिखराव का राजनीतिक फायदा उठाने के लिए अपनी रणनीति को बूथ स्तर पर और मजबूत करने में जुटी है। बहरहाल, सीट शेयरिंग में हो रही यह देरी और तल्खी यह साफ संकेत दे रही है कि उत्तर प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच चुका है।
