PM मोदी और म्यांमार राष्ट्रपति की अहम बैठक, क्या हुई बात?

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आज नई दिल्ली का हैदराबाद हाउस एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक कूटनीतिक बैठक का गवाह बना। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग (U Min Aung Hlaing) के बीच करीब दो घंटे तक बंद कमरे में द्विपक्षीय वार्ता हुई। राष्ट्रपति बनने के बाद मिन आंग ह्लाइंग की यह पहली विदेश यात्रा है, और उन्होंने अपने पहले आधिकारिक दौरे के लिए भारत को चुना है।

यह मुलाकात जितनी रणनीतिक है, उतनी ही विवादों और वैश्विक कूटनीति के केंद्र में भी है। आइए समझते हैं इस मुलाकात के पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी, वो अनकहे पहलू और भारत का वह व्यावहारिक (Pragmatic) रुख, जो इस दौरे को बेहद खास बनाता है।

विरोध और कूटनीति के बीच भारत का ‘व्यावहारिक’ रुख

इस दौरे को लेकर वैश्विक गलियारों में काफी सुगबुगाहट है। म्यांमार की निर्वासित सरकार (NUG) और कई प्रो-डेमोक्रेसी ग्रुप्स ने भारत के विदेश मंत्रालय को पत्र लिखकर इस यात्रा पर अपनी गहरी चिंता जताई थी। कुछ धड़ों ने तो म्यांमार के नेतृत्व को ‘सैन्य जुंटा’ कहकर भारत से उन्हें कूटनीतिक मान्यता न देने की अपील भी की थी।

लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया कि भारत म्यांमार को लेकर एक व्यावहारिक और यथार्थवादी (Pragmatic) नीति पर चलेगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने संकेत दिए कि एक पड़ोसी देश होने के नाते, भारत अपने राष्ट्रीय हितों, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को किसी भी वैश्विक दबाव से ऊपर रखता है।

पूर्वोत्तर की सुरक्षा और चिन स्टेट का ‘एंगल’

इस मुलाकात का सबसे बड़ा और गुप्त एजेंडा था—भारत की आंतरिक सुरक्षा। म्यांमार के चिन स्टेट (Chin State) में चल रहे आंतरिक संघर्ष का सीधा असर भारत के मिजोरम और मणिपुर जैसे राज्यों पर पड़ता रहा है। म्यांमार सेना और वहां के स्थानीय विद्रोहियों के बीच जारी जंग के चलते हाल के महीनों में भारी मात्रा में हथियारों और ड्रग्स की तस्करी की खबरें आई थीं।

पीएम मोदी और राष्ट्रपति ह्लाइंग के बीच 1,600 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार सीमा के प्रबंधन पर विस्तार से बात हुई। भारत के लिए यह सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी है कि म्यांमार की धरती का इस्तेमाल भारतीय विद्रोही गुटों (Insurgents) द्वारा न किया जा सके। यही वजह थी कि दिल्ली पहुंचते ही 31 मई को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने भी राष्ट्रपति ह्लाइंग से एक विशेष मुलाकात की थी।

कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स की सुस्त रफ्तार को रफ्तार देना

भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी म्यांमार के सहयोग के बिना अधूरी है। हैदराबाद हाउस की इस बैठक में दो सबसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर रुकी हुई फाइलों को दोबारा गति देने पर सहमति बनी:

  • कालादान मल्टी-मोडल प्रोजेक्ट: कोलकाता बंदरगाह को म्यांमार के सितवे (Sittwe) बंदरगाह से जोड़ते हुए मिजोरम तक पहुँचाने वाले इस प्रोजेक्ट की सुरक्षा को लेकर भारत चिंतित रहा है, क्योंकि यह इलाका संघर्ष से प्रभावित है।
  • त्रिपक्षीय राजमार्ग (Trilateral Highway): भारत, म्यांमार और थाईलैंड को सड़क मार्ग से जोड़ने वाले इस महा-प्रोजेक्ट के बचे हुए हिस्से को जल्द पूरा करने की समय-सीमा तय की गई।

इसके अलावा, म्यांमार के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ने भारतीय कॉरपोरेट्स को म्यांमार की महत्वाकांक्षी ‘यादनाबोन साइबर सिटी प्रोजेक्ट’ में निवेश करने के लिए खुला न्यौता दिया है।

आध्यात्मिक शुरुआत: बोधगया से दिल्ली का सफर

एक चतुर कूटनीतिक कदम के तहत, राष्ट्रपति ह्लाइंग ने अपने इस दौरे की शुरुआत राजनीतिक राजधानी दिल्ली से नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक राजधानी बोधगया (बिहार) से की। 30 मई को गया एयरपोर्ट पर बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (रिटायर्ड) ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया।

राष्ट्रपति ह्लाइंग ने यूनेस्को की विश्व धरोहर महाबोधि मंदिर और सुजाता मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की और वहां रह रहे म्यांमार के भिक्षुओं से मुलाकात की। भारत ने इसके ज़रिए यह संदेश दिया कि दोनों देशों के रिश्ते केवल व्यापारिक या सैन्य नहीं हैं, बल्कि यह सभ्यता और बौद्ध धर्म की साझी विरासत से जुड़े हैं।

अगला पड़ाव: दिल्ली से आर्थिक राजधानी मुंबई

दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से द्विपक्षीय वार्ता और साझा प्रेस बयान के बाद, राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की। इसके बाद वे ‘द लाइट एंड द लोटस’ (भगवान बुद्ध के अवशेषों की प्रदर्शनी) को देखने राय पिथौरा कल्चरल कॉम्प्लेक्स पहुंचे। यह दौरा यहीं खत्म नहीं हो रहा है। कल यानी 2 जून को म्यांमार का यह उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल मुंबई के लिए उड़ान भरेगा, जहां महाराष्ट्र के राज्यपाल और देश के दिग्गज उद्योगपतियों के साथ एक मेगा बिजनेस राउंडटेबल कॉन्फ्रेंस होनी है। भारत म्यांमार के इस नए दौर में चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव को काउंटर करने के लिए अपने आर्थिक पंख फैला रहा है।

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