Pahalgam Attack NIA Chargesheet: हिंदू पुरुषों को चुनकर मारी गोली, चौकाने वाले खुलासे झकझोर देंगे
Pahalgam Attack NIA Chargesheet: पहलगाम के सुरम्य पहाड़ों और चीखती हुई वादियों के बीच जब गोलियों की गूंज शांत हुई, तो पीछे छूट गए थे 26 निर्दोष लोगों के बेजान शरीर और खून से लथपथ बैसरन पार्क। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने पहलगाम आतंकी हमले की जो चार्जशीट दाखिल की है, उसमें हुए खुलासों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह सिर्फ एक अचानक किया गया हमला नहीं था, बल्कि सीमा पार से रची गई एक ऐसी खूनी और मजहबी साजिश थी, जिसका मकसद चुन-चुनकर हिंदू पुरुषों को मौत के घाट उतारना था। यह चार्जशीट उन दावों की भी धज्जियां उड़ाती है जो अक्सर यह कहकर नैरेटिव गढ़ते हैं कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’।
टाइमलाइन और ग्राउंड जीरो की हकीकत
हमले के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच की कमान अनंतनाग के एडिशनल SP गुलाम हसन को सौंपी। शुरुआती तफ्तीश में तीन जमीनी प्यादों के नाम सामने आए फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान, हबीब ताहिर उर्फ छोटू, और हमजा अफगानी। लेकिन इस पूरी साजिश के पीछे मुख्य दिमाग था मास्टरमाइंड सज्जाद जट्ट उर्फ अली भाई, जो पाकिस्तान में बैठकर सालों से कश्मीर में आतंक का जाल बुन रहा है।
घटना की संवेदनशीलता और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन को देखते हुए, हमले के ठीक सात दिन बाद यह केस एनआईए (NIA) को ट्रांसफर कर दिया गया। NIA के जांच अधिकारियों ने स्थानीय पुलिस (SHO पहलगाम) के साथ मिलकर आतंकियों के रूट और टाइमलाइन का खाका तैयार किया। जब टीम ग्राउंड जीरो यानी बैसरन पार्क पहुंची, तो पाया कि आतंकियों ने इस जगह का चुनाव बेहद शातिर तरीके से किया था। पार्क का भूगोल ऐसा था जहां से पूरे मैदान पर नजर रखी जा सकती थी। सीसीटीवी कैमरों का न होना और पक्की सड़क की अनुपस्थिति ने आतंकियों के लिए हमले के बाद भागना और छिपना बेहद आसान बना दिया था।
‘अज्ञात गवाह’ ने खोले राज
इस केस में सफलता तब मिली जब जांच एजेंसियों ने स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर पूछताछ अभियान शुरू किया। दुकानदार, टैक्सी ड्राइवर, पोनी (घोड़े) वाले और झोपड़ियों में रहने वाले गुज्जर-बकरवालों सहित कुल 1,113 लोगों के बयान दर्ज किए गए। इसी दौरान सुरक्षा एजेंसियों के हाथ लगा वो ‘अज्ञात गवाह’, जिसने जांच का रुख पूरी तरह बदल दिया।
गवाह ने खुलासा किया कि हमले से ठीक एक दिन पहले उसने बशीर अहमद जोठाड़ नाम के एक स्थानीय निवासी को तीन भारी हथियारों से लैस संदिग्धों के साथ देखा था। बशीर उन तीनों को परवेज अहमद नाम के व्यक्ति की ढोक (झोपड़ी) में ले गया था। गवाह ने अगले दिन सुबह भी बशीर और परवेज को बैसरन पार्क के पास संदिग्ध हालत में देखा था, जिसके कुछ ही घंटों बाद वहां लाशें बिछ गईं। इस पुख्ता सुराग के आधार पर एनआईए ने ताबड़तोड़ छापेमारी की और 22 जून को बशीर और परवेज को दबोच लिया।
झोपड़ी में जिहादी बातें और ‘पंजाबी’ लहजा
गिरफ्तारी के बाद जब परवेज अहमद से कड़ाई से पूछताछ हुई, तो उसने जो कबूलनामा किया वह चौंकाने वाला था। परवेज ने बताया, “21 अप्रैल की शाम करीब 5 बजे, जब मैं अपनी पत्नी ताहिरा और छोटे बेटे के साथ चाय पीने जा रहा था, तभी मेरा मामा बशीर तीन हथियारबंद आतंकियों के साथ अंदर घुस आया और हमें चुप रहने की धमकी दी।”
आतंकी काफी थके हुए थे। परवेज की पत्नी ताहिरा ने उनके लिए खाना तैयार किया। खाना खाते समय वे आतंकी लगातार कश्मीर की ‘आजादी’ और ‘जिहाद’ की बातें कर रहे थे। परवेज ने खुलासा किया कि वे बात तो उर्दू में कर रहे थे, लेकिन उनका लहजा (Accent) विशुद्ध पंजाबी था और वे आपस में भी पंजाबी बोल रहे थे। इससे यह साफ हो गया कि तीनों आतंकी स्थानीय नहीं, बल्कि पाकिस्तान (सरहद पार) से घुसपैठ करके आए थे।
रेकी से लेकर पॉइंट ब्लैंक रेंज पर कत्लेआम
चार्जशीट के मुताबिक, तीनों आतंकी कंबलों में हथियार छिपाकर ब्रेडांगन के रास्ते बैसरन पार्क पहुंचे। वहां दो आतंकियों ने आम नागरिकों की तरह घुल-मिलकर पहले रेकी की। इसके बाद उन्होंने अपनी पोजीशन संभाली। दो आतंकी मुख्य गेट और ढाबों के पास बैठ गए, जबकि फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान जिपलाइन के पास झाड़ियों में छिप गया।
दोपहर के ठीक 2 बजकर 23 मिनट पर सुलेमान ने अपनी अत्याधुनिक M-4 कार्बाइन से पहली फायर की। इसके तुरंत बाद बाकी दोनों आतंकियों ने AK-47 से अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। चश्मदीदों के बयानों के आधार पर चार्जशीट में जो दर्ज है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। आतंकी लोगों को अंधाधुंध मारने के साथ-साथ उन्हें रोककर उनका मजहब पूछ रहे थे “तुम हिंदू हो या मुसलमान?” वहां मौजूद लोगों को ‘कलमा’ पढ़ने के लिए मजबूर किया गया। जो लोग कलमा नहीं पढ़ पाए, उन्हें पहचानकर पॉइंट ब्लैंक रेंज (बेहद करीब) से सिर और छाती में गोली मार दी गई। गोलियां बरसाते हुए आतंकी चिल्ला रहे थे “जाओ, मोदी को बोलो…”। यह केवल एक आतंकी हमला नहीं था, बल्कि भारतीय राज्य और एक विशेष समुदाय के खिलाफ नफरत से भरा संदेश था।
जश्न और खूनी मानसिकता
दरिंदगी की हद यहीं खत्म नहीं हुई। कत्लेआम मचाकर भागते समय आतंकियों ने रास्ते में मिले एक अन्य गवाह को भी रोका। उससे कलमा पढ़वाया और मुसलमान होने की पुष्टि होने पर उसे छोड़ दिया। जाते-जाते आतंकियों ने हवा में चार राउंड फायर किए, मानो वे अपनी इस वहशी कामयाबी का जश्न मना रहे हों। उनके चेहरों पर 26 मासूमों की जान लेने का कोई पछतावा नहीं था।
आतंक का कोई धर्म नहीं होता ?
NIA की इस चार्जशीट ने उस सेक्यूलर नैरेटिव और राजनीतिक तुष्टिकरण के दावों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है, जिसमें कहा जाता है कि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता। जब बंदूक की नली पर मजहब पूछकर, कलमा न पढ़ पाने वालों को चुन-चुनकर मारा गया हो, तो साफ है कि इस आतंक का एक ही मकसद था धार्मिक आधार पर नरसंहार और जिहादी मिशन को अंजाम देना। पहलगाम की यह चार्जशीट देश को डराने के लिए नहीं, बल्कि इस कड़वी सच्चाई से रूबरू कराने का एक बड़ा दस्तावेज है।
