योगेंद्र यादव के ‘सड़क से तय होगा देश’ वाले बयान पर बवाल: ‘Grammar of Anarchy’ या हताशा का प्रदर्शन?
दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर देश की सियासत का केंद्र बना हुआ है। विपक्षी दलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के विरोध-प्रदर्शनों के बीच वरिष्ठ कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव के एक हालिया बयान ने देश में नए राजनीतिक संग्राम को जन्म दे दिया है। बीबीसी (BBC) को दिए एक इंटरव्यू की क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें वे कहते नजर आ रहे हैं कि “देश का भविष्य संसद से नहीं, सड़क से तय होगा; चुनाव से नहीं, resistance से होगा।”
योगेंद्र यादव के इस बयान के सामने आते ही सत्तापक्ष और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय समेत कई नेताओं ने इस बयान को भारत के लोकतंत्र और संविधान पर सीधा हमला करार दिया है।
अराजकता का व्याकरण !
योगेंद्र यादव के बयान के बाद 25 नवंबर 1949 का डॉ. भीमराव अंबेडकर का वह ऐतिहासिक भाषण चर्चा में आ गया है, जो उन्होंने संविधान सभा में दिया था। बाबासाहेब ने साफ शब्दों में कहा था कि जब किसी स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में संवैधानिक रास्ते खुले हों, तो सिविल डिसऑबेडिएंस (सविनय अवज्ञा), असहयोग और असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
डॉ. अंबेडकर ने बिना संवैधानिक दायरे के सड़कों पर किए जाने वाले दबाव के तरीकों को ‘Grammar of Anarchy’ (अराजकता का व्याकरण) की संज्ञा दी थी। उनका स्पष्ट मानना था कि यदि भारत में लोकतंत्र को सुरक्षित रखना है, तो सड़क से सत्ता बदलने या दबाव बनाने की व्यवस्था को त्यागना होगा।
“जब संवैधानिक रास्ते खुले हों, तब असंवैधानिक तरीकों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।”
— डॉ. बी.आर. अंबेडकर
‘रीजीम चेंज’ की साजिश या राजनीतिक हताशा?
राजनीतिक विश्लेषकों और आलोचनात्मक दौर के जानकारों का मानना है कि इस तरह के बयानों से ऐसा प्रतीत होता है कि लोकतांत्रिक जनादेश को खारिज करने की कोशिश की जा रही है। लगातार चुनावी असफलताओं के बाद विरोध के तरीकों को संसद से हटाकर पूरी तरह सड़क पर केंद्रित करने की रणनीति को ‘रीजीम चेंज’ (सत्तातख्तापलट) की वैश्विक पद्धतियों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
संवैधानिक मर्यादाओं के पक्षधरों का तर्क है कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अधिकार मौलिक है, लेकिन जब यह अधिकार जनादेश (Electoral Mandate) और संसद की सर्वोच्चता को नकारने लगे, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा बन जाता है।
भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत: वोट की चोट
भारत का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब लोकतंत्र पर संकट आया, देश की जनता ने सड़क पर हिंसा या अराजकता के बजाय ‘पोलिंग बूथ’ का रास्ता चुना।
- 1975-1977 का उदाहरण: 1975 में आपातकाल के दौर के बाद, 1977 में देश की जनता ने बैलेट बॉक्स के जरिए अपना फैसला सुनाकर तानाशाही को उखाड़ फेंका था।
- जनादेश की निरंतरता: हालिया आम चुनावों में भी देश के करोड़ों नागरिकों ने वोट डालकर अपनी पसंद की सरकार चुनी है, जो यह साबित करता है कि भारत का लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया और संसद के विश्वास पर ही टिक सकता है।
युवा पीढ़ी (Gen-Z) के सामने सवाल
वर्तमान में देश के युवाओं के सामने यह बहस बेहद महत्वपूर्ण हो गई है कि क्या वे डॉ. अंबेडकर के बनाए संवैधानिक रास्ते और संसदीय व्यवस्था के साथ खड़े हैं, या फिर सड़कों पर होने वाले दबाव और असंवैधानिक प्रतिरोध के तरीकों के साथ? भारत का भविष्य किसी भीड़ के दबाव से नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों द्वारा डाले गए वोट, संविधान और संसद की मर्यादा से ही तय होता रहा है और आगे भी होता रहेगा।
