दिल्ली बनाम पंजाब लाठीचार्ज: एक ही घटना, दो अलग चश्मे और राजनीति का असली चेहरा
आज अगर आप अपना सोशल मीडिया स्क्रॉल करेंगे, तो आपकी फ़ीड दो धड़ों में बँटी नज़र आएगी। हर तरफ़ लाठीचार्ज के वीडियो घूम रहे हैं, जो आपके मन में कई तरह के सवाल और भावनाएँ पैदा कर रहे होंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन तस्वीरों के पीछे की पूरी सच्चाई हमारे सामने आ रही है?
आज बात करेंगे कि कैसे दिल्ली में हुए लाठीचार्ज के मुद्दे का इस्तेमाल सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीतिक माइलेज हासिल करने के लिए किया जा रहा है।
पंजाब का सच: जब हक़ माँगने वालों पर बरसीं लाठियाँ
बात शुरू करते हैं पंजाब के एक शहर से, जहाँ कुछ प्रदर्शनकारी अपने हक़ों के लिए प्रशासन और सरकार के सामने शांतिपूर्ण धरने पर बैठे थे। लेकिन यह विरोध प्रदर्शन आम आदमी पार्टी की सरकार को रास नहीं आया। नतीजतन, अपने अधिकारों की माँग कर रहे सफ़ाईकर्मियों पर लाठीचार्ज कर दिया गया।
म्युनिसिपल मुलाज़म एक्शन कमेटी और सफ़ाई सेवक यूनियन के नेतृत्व में सफ़ाई कर्मचारियों ने 6 मई को हड़ताल शुरू की थी। उनकी मुख्य माँगों में वेतन वृद्धि, पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली और संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) कर्मचारियों को पक्का करना शामिल था। हड़ताल के दौरान जब ज़िला प्रशासन ने पुलिस की मदद से कूड़ा उठाने का अभियान शुरू किया, तो कर्मचारियों ने इसका विरोध किया। विरोध को दबाने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग किया और प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए लाठीचार्ज कर दिया।
पंजाब पुलिस द्वारा महिलाओं तक पर की गई इस कार्रवाई को लेकर क्या कोई सवाल खड़ा करेगा? बिल्कुल नहीं! इसके लिए तर्क दिया जाएगा कि ‘पुलिस ने स्थिति को शांत करने के लिए यह कदम उठाया।’
दिल्ली बनाम पंजाब: यह दोहरा रवैया क्यों?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर पंजाब में पुलिस की कार्रवाई ‘कानून-व्यवस्था बनाए रखने’ के नाम पर सही है, तो दिल्ली का लाठीचार्ज ग़लत कैसे हो गया?
एक तरफ़ अरविंद केजरीवाल जी दिल्ली की घटना पर सवाल उठाते हैं, कहते हैं कि बच्चों पर लाठियाँ चलाना ग़लत है। लेकिन दूसरी तरफ़, जब उन्हीं की सरकार वाले राज्य पंजाब में अपने हक़ माँग रहे कर्मचारियों पर पुलिस लाठियाँ बरसाती है, तो उस पर चुप्पी साध ली जाती है। यह दोहरा रवैया क्यों?
दिल्ली लाठीचार्ज की असल वजह
अगर दिल्ली पुलिस इतनी ही क्रूर होती, तो प्रदर्शन के पहले ही दिन लाठीचार्ज कर देती। लेकिन कार्रवाई संसद मार्च वाले दिन ही क्यों हुई?
अराजकता का माहौल: संसद मार्च के नाम पर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की जा रही थी।
हिंसा और पत्थरबाज़ी: पुलिस पर पत्थरबाज़ी की गई और स्थिति को हिंसक बनाने का प्रयास हुआ।
भीड़ का चेहरा: जो भीड़ वहाँ मौजूद थी, वह किसी भी कोण से आम छात्रों की भीड़ नहीं लग रही थी।
यह सच है कि इस तरह की झड़पों में कुछ निर्दोष लोगों को भी चोटें आती हैं, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन एक ही तरह की घटना पर दो अलग-अलग पैमाने तय करना पूरी तरह से अनुचित है।
निष्कर्ष
सीधी और साफ़ बात यह है कि लाठीचार्ज की घटनाओं को मुद्दा बनाकर अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव जैसे नेता केवल अपना राजनीतिक उल्लू सीधा कर रहे हैं। एक जगह हुई घटना को ‘बर्बरता’ बताना और दूसरी जगह वैसी ही घटना पर मौन धारण कर लेना, इस देश की राजनीति के दोहरे चरित्र को उजागर करता है।
