ट्रांसजेंडर पहचान के नाम पर ‘स्ट्रिप सर्च’? कर्नाटक हाई कोर्ट पहुँचा मामला, सिद्धारमैया सरकार के जवाब से बढ़ा विवाद
क्या ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान के नाम पर उन्हें कपड़े उतरवाकर जांच के लिए मजबूर करना जायज़ है? यह सवाल अब कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार के गले की फांस बन चुका है। मामला राज्य के हाई कोर्ट तक पहुँच चुका है और अदालत में राज्य सरकार के जवाब ने इस पूरे मुद्दे को और हवा दे दी है।
एक तरफ कांग्रेस पार्टी और उनके नेता राहुल गांधी देशभर में समानता (Equality) की बात करते हैं और सरकार को घेरते हैं, वहीं दूसरी तरफ जिस प्रदेश में उनकी सरकार है, वहाँ ट्रांसजेंडर समुदाय की गरिमा पर उठ रहे सवालों ने राजनीति गरमा दी है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद कर्नाटक सरकार द्वारा ट्रांसजेंडर समुदाय की पहचान और उनके लिए कल्याणकारी योजनाएं लागू करने के उद्देश्य से चलाए जा रहे एक सर्वे से जुड़ा है।
याचिका: अक्टूबर 2025 में अनीता ह्यूमैनिटेरियन फाउंडेशन द्वारा कर्नाटक हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई।
गंभीर आरोप: याचिका में कहा गया कि पहचान प्रक्रिया के नाम पर अस्पतालों में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की कपड़े उतरवाकर (Strip Search) तलाशी ली जा रही है, जो बेहद अपमानजनक है।
कोर्ट का अंतरिम आदेश: याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2025 को अंतरिम आदेश जारी कर सर्वे के दौरान ‘स्ट्रिप सर्च’ जैसी किसी भी प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगा दी थी।
सरकार का जवाब: “माफ़ी मांगने का सवाल ही नहीं”
अदालत की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।
आरोपों से इनकार: सरकार की ओर से कहा गया कि किसी भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की नग्न अवस्था में जांच नहीं की गई है और न ही ऐसी कोई प्रक्रिया अपनाई गई।
माफ़ी पर रुख: सरकार ने साफ़ किया कि जब ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं, तो इस पर माफ़ी मांगने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
हाई कोर्ट की टिप्पणी: अदालत ने स्पष्ट किया था कि सर्वे चाहे किसी भी कल्याणकारी योजना के लिए हो, पहचान की प्रक्रिया के दौरान प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा (Dignity) और निजता (Privacy) का सम्मान होना अनिवार्य है।
संवैधानिक अधिकार और कानूनी पहलू
यह मामला केवल एक प्रशासनिक सर्वे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा बड़ा मुद्दा है:
NALSA निर्णय: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक NALSA फ़ैसले के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को स्व-पहचान का अधिकार मिला है।
Transgender Persons Act, 2019: इस कानून के तहत राज्य सरकारों पर यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वे कल्याणकारी योजनाओं को बिना किसी उत्पीड़न या अपमान के लागू करें।
निष्कर्ष
अब इस मामले में दो परस्पर विरोधी पक्ष अदालत के सामने हैं। एक तरफ याचिकाकर्ता हैं जो अपमानजनक व्यवहार का साक्ष्य प्रस्तुत कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ सरकार है जो घटना से पूरी तरह इनकार कर रही है।
अंतिम फैसला अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और आगे की सुनवाई पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह मामला अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि मानवाधिकार, निजता और गरिमा का एक बड़ा सवाल बन चुका है। अब सभी की निगाहें कर्नाटक हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।
