पी. चिदंबरम का बड़ा दावा! क्या मानसून सत्र में फिर आएगा 131वां संविधान संशोधन विधेयक?

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मानसून सत्र शुरू होने में अभी कुछ ही दिन बाकी हैं… लेकिन उससे पहले कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक पी. चिदंबरम ने ऐसा दावा कर दिया है, जिसने दिल्ली की सियासत को गर्मा दिया है। आखिर ऐसा क्या है कि कांग्रेस को अभी से अपने सहयोगी दलों की चिंता सताने लगी है?

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने दावा किया है कि केंद्र सरकार मानसून सत्र में एक बार फिर 131वां संविधान संशोधन विधेयक ला सकती है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस विधेयक को पारित कराने के लिए डीएमके और एनसीपी (शरद पवार गुट) का समर्थन जुटाने की कोशिश की जा रही है।

यहीं से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि अप्रैल 2026 में लोकसभा में पारित न हो पाने वाला 131वां संविधान संशोधन विधेयक अब संशोधित रूप में दोबारा लाया जा सकता है। उनके मुताबिक यह विधेयक केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया को नए तरीके से लागू करने की तैयारी की जा रही है।

इसी पोस्ट में चिदंबरम ने डीएमके और एनसीपी (शरद पवार गुट) से इस विधेयक का समर्थन न करने की अपील भी की।

यहीं से सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा हो गया।

चिदंबरम ने यह भी कहा कि जब महिला आरक्षण कानून पहले ही पारित हो चुका है, तो फिर नए संविधान संशोधन की जरूरत क्यों पड़ रही है। हालांकि, इस पूरे मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी व्याख्या है।

परिसीमन को लेकर पिछले कुछ समय से देशभर में बहस चल रही है। इसके समर्थकों का तर्क है कि देश की बढ़ती आबादी को देखते हुए लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की संख्या बढ़ाना जरूरी हो सकता है। उनका कहना है कि वर्तमान में एक सांसद औसतन लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे जनप्रतिनिधियों पर काम का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

दूसरी ओर, कुछ विपक्षी दलों का कहना है कि परिसीमन की प्रक्रिया लागू होने से विभिन्न राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसी वजह से यह मुद्दा लगातार राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है।

अब चर्चा सिर्फ विधेयक की नहीं, बल्कि विपक्षी एकता की भी होने लगी है।

राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस को अपने सहयोगी दलों के रुख को लेकर चिंता है? क्या डीएमके और एनसीपी (शरद पवार गुट) भविष्य में इस मुद्दे पर कांग्रेस से अलग रुख अपना सकते हैं?

हाल के दिनों में महाराष्ट्र और तमिलनाडु की राजनीति को लेकर भी कई तरह की अटकलें लगाई जाती रही हैं। हालांकि, इन राजनीतिक चर्चाओं पर संबंधित दलों की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

फिलहाल इतना तय है कि पी. चिदंबरम की इस पोस्ट ने मानसून सत्र शुरू होने से पहले ही राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार वास्तव में ऐसा कोई विधेयक लाती है या नहीं, और यदि लाती है तो संसद में विपक्षी दलों का रुख क्या रहता है।

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