कस्टोडियल डेथ पर घिरी विजय सरकार! गुटखा आरोपी की मौत से तमिलनाडु में सियासत तेज
तमिलनाडु में एक बार फिर कस्टोडियल डेथ ने सियासत गरमा दी है। एक गुटखा बेचने के आरोपी की हिरासत में मौत… पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 19 चोटों का ज़िक्र… परिवार का पुलिस पर गंभीर आरोप… और अब मुख्यमंत्री विजय की चुप्पी को लेकर राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है।
तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले से सामने आया एक कस्टोडियल डेथ का मामला अब पूरे राज्य की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है। एक गुटखा बेचने के आरोपी की हिरासत में मौत के बाद परिवार ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर 19 चोटों का जिक्र सामने आने के बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया है।
पूरा मामला 35 वर्षीय सबरीवर्मन से जुड़ा है। पुलिस ने उन्हें प्रतिबंधित गुटखा बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया था। अदालत ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया, जिसके बाद उन्हें नागरकोइल सब-जेल में रखा गया। कुछ दिनों बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और इलाज के दौरान अस्पताल में उनकी मौत हो गई।
यहीं से पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया।
सबरीवर्मन के परिवार का आरोप है कि उनकी मौत सामान्य नहीं थी, बल्कि हिरासत में कथित मारपीट और प्रताड़ना की वजह से हुई। परिवार का कहना है कि जब उन्होंने शव देखा तो शरीर पर कई चोटों के निशान दिखाई दिए। इसके बाद इलाके में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और निष्पक्ष जांच की मांग उठने लगी।
मामले को और गंभीर तब माना गया, जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर 19 चोटों का उल्लेख सामने आया। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए नागरकोइल सब-जेल के तीन वार्डनों को गिरफ्तार कर लिया। फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि हिरासत के दौरान आखिर क्या हुआ था।
लेकिन अब यह मामला केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा।
डीएमके ने मुख्यमंत्री विजय पर निशाना साधते हुए सवाल उठाए हैं कि इतने गंभीर मामले पर उनकी ओर से अब तक कोई सार्वजनिक बयान क्यों नहीं आया। डीएमके नेताओं का कहना है कि जब राज्य में हिरासत में मौत जैसे गंभीर आरोप लगे हैं, तो मुख्यमंत्री को खुद सामने आकर जवाब देना चाहिए।
दूसरी ओर, विजय सरकार के समर्थकों का कहना है कि मामले में जांच शुरू हो चुकी है, आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा रही है। उनका तर्क है कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
हालांकि, इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है।
जिस व्यक्ति पर आरोप था, वह प्रतिबंधित गुटखा बेचने के मामले में गिरफ्तार किया गया था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर किसी आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज है, तो क्या हिरासत के दौरान उसके साथ मारपीट या कथित प्रताड़ना किसी भी स्थिति में उचित ठहराई जा सकती है? भारतीय कानून के तहत किसी भी आरोपी के साथ कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई की जानी चाहिए और यदि हिरासत में अत्याचार के आरोप सही साबित होते हैं, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होना भी उतना ही जरूरी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जांच में परिवार के आरोप सही साबित होंगे? क्या गिरफ्तार किए गए वार्डनों के खिलाफ पर्याप्त सबूत मिलेंगे? और क्या इस मामले में पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाएगा?
फिलहाल इतना तय है कि गुटखा बेचने के आरोप से शुरू हुआ यह मामला अब तमिलनाडु की राजनीति, पुलिस व्यवस्था और न्यायिक जवाबदेही—तीनों के केंद्र में आ चुका है। आने वाले दिनों में जांच और अदालत की कार्यवाही से ही इस पूरे मामले की सच्चाई सामने आएगी।
