तुष्टिकरण के गढ़ में समान कानून की आहट: पश्चिम बंगाल में UCC बिल हो सकती है पेश
Photo Source : PTI
जिस बंगाल को कभी तुष्टिकरण की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र कहा जाता था… जहाँ बहुसंख्यक आबादी की आस्था को ताक पर रखकर फैसले लेने के आरोप लगते थे… क्या अब वहीं से एक ऐतिहासिक और समान कानून की शुरुआत होने जा रही है?
पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक बेहद ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। सूबे की शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पेश करने जा रही है। अगर यह विधेयक पारित होता है, तो उत्तराखंड, असम और गुजरात के बाद पश्चिम बंगाल देश का ऐसा अगला राज्य बन जाएगा, जिसने सभी नागरिकों के लिए एक समान सिविल कानून लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में वादा किया था कि सरकार बनने के छह महीने के भीतर राज्य में UCC लागू किया जाएगा। सरकार अब इसी वादे को जमीन पर उतारने के लिए तैयार दिख रही है।
आखिर क्या है समान नागरिक संहिता (UCC)?
समान नागरिक संहिता का सीधा और सरल मतलब है कि देश या राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, गोद लेना, संपत्ति का बंटवारा और उत्तराधिकार जैसे नागरिक मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग कानून नहीं होंगे। चाहे व्यक्ति किसी भी मजहब या जाति का हो, उस पर एक ही सिविल कानून लागू होगा।
इसके समर्थकों का तर्क बेहद स्पष्ट है—जब भारत का संविधान देश के सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, तो फिर व्यक्तिगत मामलों में अलग-अलग कानून क्यों होने चाहिए? UCC के आने से महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार मिलेंगे, बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं पर पूरी तरह रोक लगेगी और कानून के सामने हर नागरिक की हैसियत एक समान होगी।
विपक्ष की चिंताएं और आदिवासी समुदाय को बड़ी राहत
जैसे ही शुभेंदु सरकार द्वारा UCC विधेयक लाने की बात साफ हुई, विपक्षी खेमे में हलचल तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि यह कदम सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ाने का प्रयास है और इससे देश की धार्मिक विविधता पर असर पड़ सकता है। विपक्ष का मानना है कि इतने संवेदनशील कानून को आम सहमति और व्यापक संवाद के बाद ही लाया जाना चाहिए।
हालांकि, इस कानून को लेकर उठ रही सबसे बड़ी चिंताओं में से एक पर सरकार ने पहले ही स्थिति स्पष्ट कर दी है। राज्य भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने साफ किया है कि संवैधानिक रूप से संरक्षित आदिवासी समुदाय को इस UCC के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा, ताकि उनकी अनूठी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं पर कोई आंच न आए।
“एक ही परिवार में दो नियम कैसे चलेंगे?”
UCC के इस पूरे विमर्श को समझने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान को याद करना जरूरी है, जो उन्होंने साल 2023 में मध्य प्रदेश के मंच से दिया था। उन्होंने देश की दोहरी कानूनी व्यवस्था पर चोट करते हुए कहा था:
“भारत में अभी शादी, तलाक़, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों में विभिन्न समुदायों में उनके धर्म और आस्था के आधार पर अलग-अलग क़ानून हैं। एक ही परिवार में दो लोगों के लिए अलग-अलग नियम नहीं हो सकते। ऐसी दोहरी व्यवस्था से आखिर घर कैसे चल पाएगा?”
निष्कर्ष: वोट बैंक की राजनीति पर संवैधानिक प्रहार
वैचारिक स्तर पर देखें तो यह लड़ाई अब दो अलग-अलग सोच के बीच की बन चुकी है। एक पक्ष का मानना है कि अलग-अलग पर्सनल लॉ भारत की विविधता की पहचान हैं, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि वास्तविक समानता तभी आ सकती है जब कानून सबके लिए एक हो।
UCC का संदेश साफ है – यह किसी को अपने धार्मिक रीति-रिवाजों को मानने से नहीं रोकता, बल्कि मजहबी एजेंडे की आड़ में संवैधानिक व्यवस्था के हनन पर रोक लगाता है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में, जो दशकों से पहचान और वोट बैंक की राजनीति का केंद्र रहा है, UCC का लागू होना देश की पूरी सियासी दिशा को बदलने की ताकत रखता है। अब देखना यह होगा कि विधानसभा के पटल पर विपक्ष इस ऐतिहासिक बदलाव का सामना किस तरह करता है।
