2021 की चुनावी हिंसा का वो अनसुना दर्द: बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद अब न्याय की चौखट पर पीड़ित महिलाएं
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पाँच साल… पूरे पाँच साल। लेकिन पश्चिम बंगाल की कुछ महिलाओं के लिए वक्त जैसे वहीं ठहर गया है। उनके ज़ख्म आज भी वैसे ही हैं, उनके आँसू आज भी वैसे ही हैं और सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है कि क्या उन्हें कभी न्याय मिलेगा? यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि एक भयावह आपबीती है जिसे सालों तक दबाने की कोशिश की गई। आज पश्चिम बंगाल में राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है, राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनी है और सुशासन की बातें हो रही हैं। लेकिन इस सुशासन के बीच उस पुराने दर्द को याद करना ज़रूरी है जिसे एक बड़े तबके ने अनसुना कर दिया था।
साल 2021 के नतीजे और हिंसा का वो खौफनाक दौर
साल 2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद तृणमूल कांग्रेस लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटी थी, लेकिन उस जीत के जश्न के साथ ही राज्य के कई हिस्सों से जो खौफनाक तस्वीरें सामने आईं, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया था। आरोप लगे कि विरोधियों और उनके परिवारों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, संपत्तियां फूंकी गईं और महिलाओं के साथ यौन हिंसा की पराकाष्ठा पार कर दी गई।
ऑर्गेनाइज़र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई पीड़ित महिलाओं की आपबीती आज भी रूह कंपा देती है। सुरक्षा कारणों से बदले गए नामों के साथ अगर बात करें, तो शर्मिला नाम की एक महिला ने आरोप लगाया था कि उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया और जब वे न्याय के लिए पुलिस स्टेशन पहुंचीं, तो पुलिस ने कथित तौर पर यह कहकर लौटा दिया कि पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं किया जाता। पीड़ित महिला का कसूर सिर्फ इतना था कि उनका परिवार एक अलग राजनीतिक विचारधारा का समर्थक था।

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इसी कड़ी में अनुसूचित जाति की एक अन्य पीड़ित महिला पिंकी को सिर्फ इसलिए बर्बरता का शिकार होना पड़ा क्योंकि वह चुनाव के दौरान पोलिंग एजेंट थीं। उन पर हमला करते समय उपद्रवियों ने उनकी धार्मिक आस्थाओं पर भी बेहद भद्दी और अश्लील टिप्पणियां की थीं। यह प्रताड़ना उस दर्द को बयां करती है जिसे बंगाल की माटी ने सालों तक अपने सीने में दबाकर रखा।
मानवाधिकार आयोग और अदालत की दखल
इस चरमराती कानून-व्यवस्था पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी उस दौर में बंगाल को लेकर बेहद गंभीर और तल्ख टिप्पणियां की थीं। इसके बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हत्या और दुष्कर्म जैसे संगीन मामलों की जांच सीधे सीबीआई (CBI) को सौंप दी थी। अदालत की सख्त निगरानी में जांच शुरू हुई और कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी, जिससे पीड़ितों में न्याय की एक उम्मीद जगी।
नई सरकार और न्याय की नई उम्मीद
अब करीब पांच साल बाद जब बंगाल की राजनीतिक फिजा बदल चुकी है, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नई सरकार ने साफ कर दिया है कि साल 2021 की उस पोस्ट-पोल वायलेंस को इतिहास के पन्नों में दबने नहीं दिया जाएगा। सरकार ने पुराने मामलों को दोबारा खोलने और नई एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया तेज कर दी है।
इसी उद्देश्य के साथ मुख्यमंत्री ने न्यायमूर्ति शम्पा घोष और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मेहेंती सेन की अध्यक्षता में एक विशेष आयोग का गठन किया है जो इन सभी मामलों की बारीकी से समीक्षा करेगा। इसके साथ ही राज्य सरकार में मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने भी सभी पीड़ित महिलाओं से आगे आकर शिकायत दर्ज कराने की भावुक अपील की है ताकि भयमुक्त माहौल में हर दोषी को उसके कर्मों की सजा दिलाई जा सके।
क्या राजनीतिक रसूख और चंद वोटों की खातिर किसी राज्य में महिलाओं की अस्मत को दांव पर लगाया जा सकता है? संदेशखाली से लेकर चुनावी हिंसा तक के ये घाव आज भी पिछली सत्ता के नेतृत्व से जवाब मांग रहे हैं।
निष्कर्ष: यह सिर्फ सत्ता का परिवर्तन नहीं है
आज अगर जमीन पर उन पुराने अपराधियों और उपद्रवियों के खिलाफ जनता का गुस्सा अलग-अलग रूपों में फूट रहा है, तो इसे केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता नहीं कहा जा सकता। यह उस दबे हुए दर्द और आक्रोश का गुबार है जो सालों तक न्याय न मिलने के कारण भीतर ही भीतर सुलग रहा था।
सौ बात की एक बात यह है कि बंगाल की जो कहानियां सोशल मीडिया या खबरों के जरिए बाहर आती हैं, हकीकत जमीन पर उससे कहीं ज्यादा भयावह रही है। राज्य में हुआ यह बड़ा राजनीतिक बदलाव सिर्फ एक दल से दूसरे दल के हाथ में सत्ता का जाना भर नहीं है, बल्कि यह त्रस्त हो चुकी जनता के उस गहरे दर्द की अभिव्यक्ति है जो अब न्याय की उम्मीद में नई व्यवस्था की तरफ देख रही है।
