देशहित बनाम विदेशी फंडिंग: FCRA नियमों में कड़ाई और अमेरिकी सांसदों की बेचैनी के पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी
क्या भारत में NGO चलाना कोई अपराध है? क्या विदेशों से पैसा लेना गैर-कानूनी है?
जवाब है – बिल्कुल नहीं। न तो देश में समाज सेवा के लिए NGO चलाना अपराध है और न ही नियमानुसार विदेशी फंडिंग हासिल करना। लेकिन सवाल और संदेह तब पैदा होता है, जब समाज सेवा और विकास के नाम पर आने वाला विदेशी पैसा देश के ही खिलाफ इस्तेमाल होने लगे। यही वजह है कि मोदी सरकार ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के नियमों को एक बार फिर कड़ा कर दिया है।
अब विदेशी फंडिंग लेने वाले संगठनों को सिर्फ यह नहीं बताना होगा कि पैसा कहां से आया, बल्कि यह भी साबित करना होगा कि वे जमीन पर क्या काम कर रहे हैं और क्या वह पैसा उसी उद्देश्य में खर्च हो रहा है जिसके लिए मिला था।
नए FCRA नियमों में क्या बदला? पारदर्शिता की नई परिभाषा
सरकार के नए संशोधनों का सीधा मकसद विदेशी पैसे के लेन-देन में 100% पारदर्शिता लाना है। नए नियमों के तहत अब कई बड़े बदलाव किए गए हैं:
- डिजिटल उपस्थिति की जानकारी: अब रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करने या सालाना रिटर्न दाखिल करने वाले हर संगठन को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट्स और वेबसाइट की पूरी जानकारी सरकार को देनी होगी।
- ‘डोनर एड्वाइज़्ड फंड’ पर शिकंजा: जब पैसा किसी छिपे हुए स्रोत या तीसरे जरिए से आता है, तो अक्सर असली डोनर का पता नहीं चलता। अब ऐसे मामलों में संगठनों को असली दानदाता का नाम, उसका पता, ईमेल आईडी और मिली हुई पाई-पाई का हिसाब देना अनिवार्य होगा।
सरकार को क्यों उठाने पड़े इतने सख्त कदम?
पिछले कुछ वर्षों में गृह मंत्रालय और देश की जांच एजेंसियों ने विदेशी फंडिंग का एक बेहद खतरनाक और चिंताजनक पैटर्न डिकोड किया है। एजेंसियां इस नतीजे पर पहुंची हैं कि कुछ विदेशी वित्तपोषित संगठन (NGOs) अपने घोषित उद्देश्यों से भटककर देश की रणनीतिक और आर्थिक परियोजनाओं को ठप करने के अभियानों में शामिल थे।
जांच एजेंसियों द्वारा डिकोड किया गया पैटर्न: पहले देश के किसी बड़े और महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के खिलाफ एक नैरेटिव (अभियान) शुरू होता है, फिर स्थानीय स्तर पर भारी विरोध प्रदर्शन खड़े किए जाते हैं, इसके बाद अदालतों में कानूनी चुनौतियां देकर काम रुकवाया जाता है, और अंत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश होती है।
इसी टूलकिट या पैटर्न के कारण देश की कई बड़ी परियोजनाएं सालों-साल लटकी रहीं, जिससे देश को अरबों रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। इसके बड़े उदाहरण कुडनकुलम परमाणु परियोजना और पॉस्को (POSCO) स्टील प्लांट जैसे मेगा प्रोजेक्ट्स हैं।
इतना ही नहीं, हाल के दिनों में हमारे पड़ोसी देशों—बांग्लादेश और नेपाल में जो राजनीतिक उथल-पुथल और विद्रोह की स्थितियां बनीं, उसके पीछे भी विदेशी ताकतों द्वारा की गई इसी तरह की ‘फंडिंग’ और ‘निवेश’ को जिम्मेदार माना जाता है। ऐसे में भारत अपनी सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम नहीं ले सकता।
धर्मांतरण और विदेशी पैसे का गठजोड़
इस सख्त कदम के पीछे एक दूसरा बड़ा कारण अवैध धार्मिक धर्मांतरण भी है। बीते सालों में ऐसी कई रिपोर्ट और शिकायतें आईं, जहां दूरदराज और आदिवासी इलाकों में समाज सेवा के मुखौटे के पीछे विदेशी पैसे के दम पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के खेल को अंजाम दिया गया।
गृह मंत्रालय का रुख इस पर हमेशा से साफ रहा है कि विदेशी धन का उपयोग प्रलोभन, दबाव या किसी भी अन्य माध्यम से धार्मिक परिवर्तन के लिए नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि साल 2019 में भी नियमों में संशोधन करके NGOs के प्रमुख पदाधिकारियों के लिए यह शपथ लेना अनिवार्य किया गया था कि वे कभी भी धर्म परिवर्तन या सांप्रदायिक तनाव फैलाने जैसी गतिविधियों में शामिल नहीं रहे हैं।
भारत का फैसला, तो अमेरिका को क्यों लगी मिर्च?
भारत सरकार के इस संप्रभु फैसले पर सात समंदर पार अमेरिका में भी हलचल तेज हो गई है। हाल ही में अमेरिकी सांसदों ने भारत के इन FCRA नियमों पर चिंता जताई। अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के प्रमुख जेम्स रिष ने बाकायदा बयान जारी कर कहा कि इन बदलावों का भारत के ‘सिविल सोसाइटी समूहों’ पर बुरा असर पड़ सकता है।
यहाँ आकर पूरा मामला बिल्कुल शीशे की तरह साफ हो जाता है। जब भारत सरकार अपने देशहित, आर्थिक सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए कोई कानून बनाती है, तो अमेरिकी सांसदों को उससे दर्द क्यों होता है? यह बेचैनी खुद-ब-खुद बयां कर देती है कि मोदी सरकार ने नब्ज पर बिल्कुल सही जगह हाथ रखा है।
निष्कर्ष: संप्रभुता से कोई समझौता नहीं
साफ है कि मोदी सरकार का यह कदम किसी ईमानदार या जनकल्याण का काम करने वाले NGO के खिलाफ नहीं है। जो संस्थाएं पारदर्शी हैं और वाकई समाज सेवा कर रही हैं, उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है। यह कानून सिर्फ उन चेहरों को बेनकाब करने के लिए है जो ‘सेवा के मुखौटे’ में देश की जड़ों को कमजोर करने का एजेंडा चला रहे हैं।
