पीओके की हिंसा से क्या हिलने वाली है शहबाज़ शरीफ़ की कुर्सी ? मुनीर नहीं संभाल पा रहे हैं हालात
POK में हिंसा की तस्वीर
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) एक बार फिर बड़े राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ दिनों में क्षेत्र के कई शहरों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन, बंद और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों की खबरें सामने आई हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि यह मुद्दा केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता, मानवाधिकारों और क्षेत्रीय भू-राजनीति से भी जुड़ गया है।
आखिर विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
ताजा विवाद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों को लेकर शुरू हुआ। ये सीटें उन लोगों के लिए आरक्षित हैं जो POK में नहीं रहते, बल्कि पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में बसे हुए हैं।
स्थानीय संगठनों और कई नागरिक समूहों का आरोप है कि इन सीटों के जरिए इस्लामाबाद लंबे समय से क्षेत्र की राजनीति पर अपना प्रभाव बनाए रखता है। उनका कहना है कि इससे स्थानीय आबादी की राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व कमजोर होता है।
जब अदालत ने इन सीटों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होने की बात कही, तो विरोध प्रदर्शनों ने तेज रूप ले लिया। मुज़फ़्फराबाद, रावलाकोट और अन्य शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए।
JAAC पर कार्रवाई और बढ़ता तनाव
इस आंदोलन का नेतृत्व कर रही Joint Awami Action Committee (JAAC) कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक और जनसंगठनों का मंच है। JAAC पिछले कुछ वर्षों से बिजली, महंगाई, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अधिकारों जैसे मुद्दों को लेकर सक्रिय रही है।
विरोध प्रदर्शनों के बीच प्रशासन ने JAAC पर प्रतिबंध लगा दिया और उसके नेताओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी। इसके बाद कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों की खबरें सामने आईं।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए, इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगाया गया और कई इलाकों में सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ।
क्या यह पहला आंदोलन है?
नहीं। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में असंतोष पिछले कई वर्षों से बढ़ रहा है।
साल 2023 में महंगाई, बिजली दरों और गेहूं की कीमतों को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। उसी दौरान JAAC एक प्रभावशाली जनमंच के रूप में उभरा।
इसके बाद मई 2024 में हजारों लोगों ने मुज़फ़्फराबाद की ओर “लॉन्ग मार्च” निकाला। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें थीं:
- बिजली दरों में कमी
- गेहूं पर सब्सिडी
- राजनीतिक नेतृत्व और अभिजात वर्ग के विशेषाधिकारों में कटौती
उस आंदोलन के दौरान भी हिंसक झड़पें हुई थीं और अंततः पाकिस्तान सरकार को आर्थिक राहत पैकेज की घोषणा करनी पड़ी थी।
2025 से 2026 तक क्यों बढ़ता गया गुस्सा?
विश्लेषकों का मानना है कि पिछले तीन वर्षों से जमा हो रहा असंतोष अब बड़े राजनीतिक संकट का रूप ले चुका है।
पहले जहां आंदोलन महंगाई और बिजली जैसे मुद्दों तक सीमित थे, वहीं अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व, भ्रष्टाचार और इस्लामाबाद के कथित हस्तक्षेप जैसे मुद्दे भी प्रमुख बन चुके हैं।
कई स्थानीय समूहों का आरोप है कि POK के राजनीतिक निर्णय स्थानीय जनता की इच्छा से अधिक पाकिस्तान की केंद्रीय सत्ता और सुरक्षा प्रतिष्ठान के प्रभाव में लिए जाते हैं।
CPEC और चीन की भूमिका
इस पूरे विवाद में एक और महत्वपूर्ण पहलू चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) भी है।
साल 2015 में चीन और पाकिस्तान के बीच शुरू हुई इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत अरबों डॉलर के निवेश की घोषणा की गई थी। बाद में विभिन्न परियोजनाओं को जोड़ने के बाद इसका कुल आकार 60 अरब डॉलर से अधिक बताया जाने लगा।
CPEC के कई हिस्से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र से गुजरते हैं। स्थानीय स्तर पर कुछ संगठनों का आरोप है कि इन परियोजनाओं से होने वाले लाभ का पर्याप्त हिस्सा स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंच रहा है।
इसी कारण CPEC को लेकर भी समय-समय पर विरोध और असंतोष देखने को मिला है।
भारत की प्रतिक्रिया
देश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा – “हम इस मामले में पाकिस्तान की तरफ़ से फेक न्यूज़ और वीडियो फैलाने का सिलसिला देख रहे हैं। यह पाकिस्तान की अपनी नाकामियों को छिपाने और मानवाधिकारों के उल्लंघन से ध्यान भटकाने की एक हताश कोशिश है।”
वैसे POK में लगी आग से भारत को क्या फ़ायदा हो सकता है? अगर POK मूल रूप से आज़ाद हो जाता है, तो आधिकारिक तौर पर — मैं ये जो आधिकारिक तौर पर कह रहा हूँ, वह UN के नज़रिए से कह रहा हूँ — उसका स्वरूप बदल सकता है। वैसे POK तो भारत का हिस्सा था और हिस्सा रहेगा।
और जो साजिश POK में वैश्विक स्तर पर रची जा रही है, वह ख़त्म हो जाएगी। वैसे POK की जो स्थिति है, उसे देखकर ऐसा ही महसूस हो रहा है कि भूतकाल में की गई गलती भविष्य का नासूर बन जाती है।
