महाराष्ट्र जैसा खेला अब बंगाल में? छिन सकती है ममता बनर्जी की पार्टी और ‘घास-फूल’ सिंबल, जानें क्या है पूरा मामला

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कोलकाता: क्या महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे) और एनसीपी (शरद पवार) के साथ जो हुआ, वही कहानी अब पश्चिम बंगाल में दोहराई जाने वाली है? राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक बेहद चौंकाने वाली चर्चा गर्म है। कयास लगाए जा रहे हैं कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और उनका प्रसिद्ध चुनाव चिह्न ‘घास-फूल’ (Twin Flowers) उनके हाथ से निकल सकता है।

हालिया घटनाक्रमों और राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या बंगाल में भी महाराष्ट्र जैसा कोई ‘अदृश्य खेल’ चल रहा है।

क्या है पूरा मामला और क्यों उठ रहे हैं सवाल?

महाराष्ट्र में जिस तरह एकनाथ शिंदे ने बगावत कर असली ‘शिवसेना’ और पार्टी सिंबल ‘तीर-कमान’ पर दावा ठोक दिया था, ठीक वैसी ही पटकथा बंगाल में भी लिखे जाने की आशंका जताई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, टीएमसी के भीतर अंदरूनी कलह और केंद्रीय एजेंसियों (ED-CBI) की लगातार कार्रवाई से पार्टी के कुछ धड़े असहज हैं।

बड़ी बात: यदि पार्टी के विधायकों और सांसदों का एक बड़ा धड़ा टूटकर अलग होता है और वह चुनाव आयोग के सामने ‘असली टीएमसी’ होने का दावा करता है, तो ममता बनर्जी के सामने कानूनी और राजनीतिक संकट खड़ा हो सकता है।

इन 3 मुख्य वजहों से गर्म है बाजार:

  • अंदरूनी खींचतान: ममता बनर्जी और पार्टी के नंबर-2 माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी के समर्थकों के बीच समय-समय पर ‘ओल्ड गार्ड बनाम न्यू ब्रिगेड’ (पुराने नेता बनाम नए नेता) की लड़ाई सामने आती रही है।
  • दलबदल का इतिहास: बंगाल की राजनीति में नेताओं का एक दल से दूसरे दल में जाना कोई नई बात नहीं है। यदि विरोधी खेमा किसी बड़े चेहरे को मोहरा बनाकर सेंधमारी करता है, तो खेल पलट सकता है।
  • कानूनी दांवपेंच: चुनाव आयोग के ‘सिंबल ऑर्डर 1968’ के तहत बहुमत (विधायकों और सांसदों की संख्या) जिसके पास होगी, पार्टी और सिंबल उसी का हो जाता है। महाराष्ट्र का उदाहरण सबके सामने है।

क्या वाकई आसान है ममता से TMC छीनना?

भले ही राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो, लेकिन जमीन पर ममता बनर्जी की पकड़ को कमजोर करना इतना आसान नहीं है। ममता बनर्जी खुद टीएमसी का सबसे बड़ा चेहरा हैं और पश्चिम बंगाल की जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बेहद मजबूत है। इसके बावजूद, जिस तरह से भारतीय राजनीति में पिछले कुछ सालों में अप्रत्याशित दलबदल और कानूनी तख्तापलट हुए हैं, उसने क्षेत्रीय दलों की चिंता जरूर बढ़ा दी है।

अब देखना यह होगा कि ममता बनर्जी इस संभावित खतरे से निपटने के लिए क्या चक्रव्यूह रचती हैं और पार्टी को एकजुट रखने में कितनी कामयाब होती हैं।

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