नई दिल्ली: वर्तमान में विश्व एक गंभीर वैश्विक संकट और अमेरिका-ईरान के बीच जारी गतिरोध के दौर से गुजर रहा है। लेकिन इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत ने एक ऐसा ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला है, जिसकी कल्पना बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक किसी ने नहीं की थी। 26 मई को दिल्ली में आयोजित हुई क्वाड (QUAD) देशों की बैठक ने साफ कर दिया है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अब भारत की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलेगा।
क्वॉड मीटिंग: चीन की घेराबंदी और भारत का दबदबा
क्वाड समूह (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत) के विदेश मंत्रियों की इस बैठक में इंडो-पैसिफिक सुरक्षा को लेकर गहन चर्चा हुई। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और पीएम मोदी की इस रणनीति का जवाब न तो चीन के पास है और न ही उसके टुकड़ों पर पलने वाले पाकिस्तान के पास।
बैठक के मुख्य बिंदु:
इंडो-पैसिफिक सुरक्षा: क्षेत्र को ‘फ्री और सिक्योर’ बनाने पर जोर।
सप्लाई चेन और रेयर मिनरल्स: चीन पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था।
तकनीकी सहयोग: एआई (AI), समुद्री सुरक्षा और भविष्य की टेक्नोलॉजी पर चर्चा।
एस. जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हमने स्वाभाविक रूप से इंडो-पैसिफिक से जुड़े उन खास मुद्दों पर ध्यान दिया है जो वैश्विक स्थिरता के लिए जरूरी हैं।”
ब्रिक्स और क्वॉड का संतुलन: भारत बना एशिया का केंद्र
दिलचस्प बात यह है कि इसी साल भारत ब्रिक्स (BRICS) समूह की अध्यक्षता भी कर रहा है। जहाँ क्वॉड इंडो-पैसिफिक में चीन के प्रभाव को संतुलित करता है, वहीं ब्रिक्स पश्चिमी देशों के दबदबे के विकल्प के रूप में उभर रहा है। इन दोनों महत्वपूर्ण मंचों के केंद्र में भारत का होना यह साबित करता है कि एशिया का असली ‘ग्लोबल मार्केट’ और रणनीतिक केंद्र अब नई दिल्ली है।
पीएम मोदी की ‘ग्लोबल स्ट्रैटेजी’ और ट्रम्प का भरोसा
जो लोग पीएम मोदी की विदेश यात्राओं की आलोचना कर रहे थे, उनके लिए पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का बयान एक करारा जवाब है। ट्रम्प ने कहा था, “मैं मोदी का बहुत बड़ा फैन हूँ, भारत मुझ पर 100% भरोसा कर सकता है।” यह बयान दर्शाता है कि वैश्विक मंच पर भारत की साख कितनी मजबूत हो चुकी है। आम जनता को क्या मिलेगा?
अक्सर सवाल उठता है कि इन अंतरराष्ट्रीय बैठकों से आम आदमी को क्या फायदा? जवाब सीधा है— सस्ता पेट्रोल-डीजल और सुलभ संसाधन। जब भारत ग्लोबल मंच का ‘सरपंच’ बनता है, तो वह अपनी शर्तों पर व्यापारिक समझौते करता है।
इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब ट्रंप प्रशासन ने भारत पर भारी टैरिफ लगाए थे। भारत ने तुरंत RCEP (Regional Comprehensive Economic Partnership) का विकल्प चुना, जिससे अमेरिका को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी और भारत पर लगे टैरिफ घटाने पड़े। यह भारत की ‘इकोनॉमिक डिप्लोमेसी’ की जीत थी।