कर्नाटक में डेमोग्राफी बदलने की साजिश? बंगाल में सख्ती के बाद दक्षिण भारत बने अवैध घुसपैठियों के ‘Safe Haven’
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कर्नाटक की राजनीति में एक तरफ जहाँ सत्ता के शीर्ष पर नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट है, वहीं पर्दे के पीछे से राज्य की जनसांख्यिकी (Demography) को बदलने की एक बड़ी साजिश की खबरें सामने आ रही हैं। पश्चिम बंगाल में नई सरकार के गठन और अवैध घुसपैठियों के खिलाफ शुरू हुई कड़ी कार्रवाई के बाद, अब दक्षिण भारत के राज्यों, विशेषकर कर्नाटक में अवैध बांग्लादेशियों की आमद ने सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय संगठनों की चिंता बढ़ा दी है।
बंगाल का ‘3D’ मॉडल और घुसपैठियों में खौफ
पश्चिम बंगाल की वर्तमान सरकार ने अवैध घुसपैठ को जड़ से मिटाने के लिए ‘3D’ (Detect, Detain, Delete) नीति लॉन्च की है। इस शक्ति का असर यह हुआ है कि दशकों से बंगाल में अवैध रूप से रह रहे लोग अब खुद मीडिया के सामने स्वीकार कर रहे हैं कि उनके पास भारत की नागरिकता के वैध प्रमाण नहीं हैं। शुभेंदु सरकार की इस कार्रवाई के डर से अवैध घुसपैठिये अब बंगाल छोड़कर उन राज्यों का रुख कर रहे हैं जहाँ उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिलने की उम्मीद है।
क्या कर्नाटक बन रहा है अवैध प्रवासियों का केंद्र?
मीडिया रिपोर्ट्स और खुफिया सूत्रों के हवाले से चौंकाने वाली जानकारी सामने आ रही है। कर्नाटक के स्थानीय मीडिया पोर्टल ‘उदयवाणी’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में करीब 20 लाख अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के होने का अनुमान है।
श्री राम सेना के प्रमुख प्रमोद मुथालिक और अन्य हिंदू संगठनों ने इस पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। आशंका जताई जा रही है कि बंगाल से भाग रहे संदिग्ध लोग अब कर्नाटक के तटीय और मालनाड क्षेत्रों (तटीय जिलों) में शरण ले रहे हैं। इन क्षेत्रों में मछली पकड़ने के व्यवसाय और मजदूरी की आड़ में ये लोग आसानी से घुल-मिल जाते हैं।
राजनीतिक समीकरण और ‘सेफ हेवन’ का तर्क
विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि अवैध घुसपैठियों के लिए कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य ‘सुरक्षित पनाहगाह’ (Safe Haven) बनते जा रहे हैं। इसके पीछे का मुख्य कारण इन राज्यों की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को बताया जा रहा है:
- कर्नाटक: यहाँ कांग्रेस की सरकार है।
- केरल: यहाँ वामपंथी और कांग्रेस गठबंधन का प्रभाव है।
- तमिलनाडु: यहाँ कांग्रेस और TVK गठबंधन की उपस्थिति है।
आरोप है कि जिस तरह पिछले 15 वर्षों तक पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल किया गया, अब वही ‘बंगाल मॉडल’ दक्षिण भारत के इन तीन राज्यों में दोहराने की तैयारी है।
पहचान पत्र का संकट: 80% के पास ‘भारतीय’ दस्तावेज
सबसे गंभीर चिंता की बात यह है कि इन संदिग्ध घुसपैठियों में से 70-80% लोगों ने फर्जी तरीके से भारतीय पहचान पत्र (आधार कार्ड, राशन कार्ड) बनवा लिए हैं। खुफिया सूत्रों के अनुसार, ये दस्तावेज पिछले 10-15 वर्षों के दौरान अवैध रूप से तैयार किए गए हैं। जब बंगाल में ‘Detect’ की प्रक्रिया शुरू हुई, तो कई लोगों ने माना कि उनके पूर्वज अवैध रूप से आए थे, लेकिन स्थानीय मिलीभगत से उन्होंने कागजात बनवा लिए। अब यही लोग कर्नाटक और तमिलनाडु के तटीय इलाकों में अपनी नई पहचान स्थापित कर रहे हैं।
निष्कर्ष: क्या केंद्र सरकार करेगी हस्तक्षेप?
तटीय राज्यों की सुरक्षा और वहां की डेमोग्राफी का बदलना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है। अब सवाल यह उठता है कि क्या केंद्र सरकार कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसी राज्य सरकारों पर दबाव बनाएगी कि वे भी बंगाल की तरह ‘Detect, Detain and Delete’ की प्रक्रिया अपनाएं?
यदि समय रहते इन अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें वापस नहीं भेजा गया, तो भविष्य में यह समस्या दक्षिण भारत की सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।
