असम में UCC की आहट: हिमंता सरकार का बड़ा कदम और ओवैसी की छटपटाहट, जानें क्या है पूरा विवाद?

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Assam UCC

असम सरकार ने राज्य विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) बिल पेश कर दिया है। गोवा, गुजरात और उत्तराखंड के बाद असम देश का चौथा ऐसा राज्य बनने की ओर अग्रसर है जहाँ सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून होगा। लेकिन इस फैसले ने हैदराबाद तक सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है।

असम में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला लिया है, जिसकी गूँज पूरे देश में सुनाई दे रही है। पिछले 12 वर्षों में भाजपा सरकार ने कई ऐसे साहसिक निर्णय लिए हैं, जिन्हें कांग्रेस ने अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के कारण ठंडे बस्ते में डाल दिया था—चाहे वह राम मंदिर हो, अनुच्छेद 370 का खात्मा हो, तीन तलाक हो या फिर CAA। अब इसी कड़ी में असम सरकार ने UCC बिल विधानसभा में पेश कर मिसाल पेश की है।

असदुद्दीन ओवैसी को क्यों लगी ‘मिर्ची’?

असम में UCC की सुगबुगाहट शुरू होते ही AIMIM प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी का तीखा विरोध सामने आया है। ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (Twitter) पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए इस बिल को “भेदभावपूर्ण” बताया है।

ओवैसी के मुख्य तर्क:

  1. आदिवासियों को छूट: ओवैसी का कहना है कि यह कानून “यूनिफॉर्म” नहीं है क्योंकि इसमें आदिवासी समुदायों को बाहर रखा गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि केवल आदिवासियों की स्वायत्तता ही क्यों सुरक्षित रखी जा रही है?
  2. विरासत का अधिकार: उन्होंने दावा किया कि इस्लाम में विरासत के कड़े नियम हैं, जहाँ किसी बेटी को हक से वंचित नहीं किया जा सकता, लेकिन UCC वसीयत के जरिए बेटियों का हक छीनने की अनुमति देता है।
  3. लैंगिक न्याय पर सवाल: ओवैसी ने इस कानून को थोपा हुआ करार देते हुए कहा कि यह लैंगिक न्याय प्रदान नहीं करता।

असम UCC बिल की मुख्य विशेषताएँ

आखिर इस बिल में ऐसा क्या है जिससे ओवैसी जैसे नेता असहज महसूस कर रहे हैं? आइए जानते हैं इस कानून के प्रमुख बिंदु:

  • बहुविवाह (Polygamy) पर रोक: बिल में बहुविवाह और दो विवाह को पूरी तरह गैर-कानूनी बनाने का प्रावधान है। अब सभी समुदायों (हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई) के लिए ‘एक विवाह’ अनिवार्य होगा।
  • सजा का प्रावधान: भारतीय न्याय संहिता के तहत, दो-विवाह या धोखाधड़ी से की गई शादियों के लिए 7 साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
  • शादी की न्यूनतम उम्र: लड़कों के लिए 21 वर्ष और लड़कियों के लिए 18 वर्ष की आयु अनिवार्य की गई है।
  • रजिस्ट्रेशन अनिवार्य: सभी शादियों और तलाक का 60 दिनों के भीतर सरकारी पंजीकरण (Registration) कराना अनिवार्य होगा।
  • समान अधिकार: लिव-इन रिलेशनशिप, उत्तराधिकार और तलाक के मामलों में महिलाओं को समान कानूनी सुरक्षा दी जाएगी।

आदिवासियों को बाहर क्यों रखा गया?

असम के UCC में आदिवासी समुदाय को शामिल न करने के पीछे ठोस संवैधानिक कारण हैं। आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा संविधान की छठी अनुसूची (6th Schedule) के तहत की जाती है।

गृह मंत्री अमित शाह ने भी दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट किया था:

“एक साजिश के तहत दावा किया जा रहा है कि UCC आदिवासियों को उनके रीति-रिवाजों से वंचित कर देगा। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि UCC का कोई भी प्रावधान आदिवासी समुदायों या वनवासी समाज पर नहीं थोपा जाएगा।”

निष्कर्ष: राजनीति बनाम सुधार

स्पष्ट है कि गृह मंत्री और असम सरकार के नियम जनजातीय समुदायों की विशिष्टता का सम्मान करते हैं। विरोध की असली वजह ‘बहुविवाह’ पर लगने वाली रोक और मजहब के नाम पर चलने वाली पुरानी राजनीति का खत्म होना माना जा रहा है। UCC लागू होने के बाद कानून की नजर में सभी बराबर होंगे, जिससे मजहब के नाम पर वोटबैंक की राजनीति करने वालों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

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