Naxal Free India: कैसे अमित शाह की नीतियों से ‘रेड कॉरिडोर’ बना ‘ग्रोथ कॉरिडोर’

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Naxal Free India: एक दौर था जब छत्तीसगढ़ का बस्तर और देश के कई अन्य राज्य लाल आतंकवाद (नक्सलवाद) के खौफ के साए में जीने को मजबूर थे। बस्तर के जिन इलाकों में कभी नेता और प्रशासनिक अधिकारी जाने से भी डरते थे, आज वहां विकास की नई बयार बह रही है। एक दशक पहले तक जो काम पूरी तरह नामुमकिन नजर आता था, उसे गृह मंत्री अमित शाह की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और सुरक्षा बलों के शौर्य ने मुमकिन कर दिखाया है। आज भारत नक्सलवाद की बेड़ियों से लगभग मुक्त हो चुका है। आइए विस्तार से जानते हैं कि कैसे देश का ‘रेड कॉरिडोर’ अब ‘ग्रोथ कॉरिडोर’ में तब्दील हो गया है।

150 जिलों में फैला था ‘रेड कॉरिडोर’

एक समय था जब देश के 10 से ज्यादा राज्यों के लगभग 150 से अधिक जिले नक्सली हिंसा की चपेट में थे। नेपाल के पशुपतिनाथ से लेकर आंध्र प्रदेश के तिरुपति तक फैले इस अशांत इलाके को ‘रेड कॉरिडोर’ कहा जाता था। लेकिन पिछले कुछ सालों में सरकार की सख्त नीतियों, सुरक्षा बलों के कड़े कदमों और बेहतर समन्वय के कारण आज नक्सली हिंसा अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है या यूं कहें कि लगभग खत्म हो गई है।

‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और बड़े सैन्य अभियान

इस ऐतिहासिक बदलाव के पीछे सबसे बड़ा हाथ केंद्र सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति का है। सुरक्षा बलों ने न केवल नक्सलियों के कोर गढ़ में घुसकर ‘ऑपरेशन प्रहार’ और ‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’ जैसे कड़े और निर्णायक अभियान चलाए, बल्कि घने जंगलों के भीतर ‘फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस’ (FOB) भी स्थापित किए। इन नए सुरक्षा कैंपों ने नक्सलियों की सप्लाई लाइन को पूरी तरह से काट दिया और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

पुनर्वास नीति से टूटा नक्सलियों का कैडर बेस

सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ सरकार की ‘पुनर्वास और आत्मसमर्पण नीति’ ने इस लड़ाई में टर्निंग पॉइंट का काम किया। मुख्यधारा से भटके हुए जिन युवाओं ने बंदूक छोड़कर आत्मसमर्पण किया, उन्हें सरकार की तरफ से आर्थिक मदद, जमीन और रोजगार के नए अवसर दिए गए। इस मानवीय दृष्टिकोण का नतीजा यह हुआ कि नक्सलियों का कैडर बेस पूरी तरह से चरमरा गया और युवाओं ने हिंसा का रास्ता छोड़ देश की तरक्की में शामिल होना चुना।

बुनियादी ढांचे का विकास: सड़क, बिजली और संचार

नक्सलवाद के पनपने और फैलने की सबसे बड़ी वजह इन इलाकों का मुख्यधारा से कटा होना और वहां सड़क, बिजली तथा संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं का न होना था। सरकार ने समय रहते समझा कि इस समस्या का स्थायी समाधान सिर्फ और सिर्फ विकास है। इसी रणनीति के तहत ‘रेड कॉरिडोर’ को ‘ग्रोथ कॉरिडोर’ में बदलने का काम शुरू हुआ।

  • सड़कों और पुलों का जाल: प्रभावित क्षेत्रों में हजारों किलोमीटर लंबी सड़कों और सैकड़ों पुलों का निर्माण किया गया, जिससे आम जनता और सुरक्षा बल आसानी से मुख्य शहरों से जुड़ सके।
  • डिजिटल कनेक्टिविटी: जंगलों के भीतर हजारों मोबाइल टावर लगाए गए, ताकि दूर-दराज के गांवों तक इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क पहुंच सके।
  • बैंकिंग सुविधाएं: इन इलाकों में नए बैंक और पोस्ट ऑफिस खोले गए, जिससे सरकारी योजनाओं का पैसा (DBT) सीधे आदिवासियों के खातों तक पहुंचने लगा और बिचौलियों का खात्मा हुआ।

शिक्षा और रोजगार से बदली बस्तर की तस्वीर

इस विकास का सबसे खूबसूरत और प्रभावी चेहरा शिक्षा के क्षेत्र में देखने को मिला है। नक्सल प्रभावित इलाकों के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए ‘एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय’ (EMRS) खोले गए हैं, जहां गरीब आदिवासी बच्चों को देश के किसी भी बड़े कॉन्वेंट स्कूल जैसी विश्वस्तरीय शिक्षा मिल रही है। इसके साथ ही, स्थानीय आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए वन उत्पादों का सही मूल्य सुनिश्चित किया जा रहा है। आज छत्तीसगढ़ के बस्तर के कई स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ब्रांडिंग मिल रही है। जो युवा कभी डर के साए में जीते थे, आज वो स्टार्टअप्स और नौकरियों के जरिए देश की जीडीपी में योगदान दे रहे हैं। नक्सल मुक्त भारत का यह अभियान सिर्फ एक सैन्य जीत नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतंत्र, शांति और विकास की बहुत बड़ी जीत है। लाल गलियारे का ‘ग्रोथ कॉरिडोर’ में बदलना इस बात का जीता-जागता सबूत है कि जब बंदूक की जगह कलम और हिंसा की जगह पक्की सड़कें और इंटरनेट ले लेते हैं, तो देश की प्रगति को कोई नहीं रोक सकता।

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