PM Modi और Meloni के बीच बचपन का क्या कनेक्शन है?

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साल 2022 में जब यूरोप के सबसे खूबसूरत देशों में से एक, इटली के चुनाव नतीजे घोषित हुए, तो पूरी दुनिया हैरान रह गई। एक ऐसी महिला देश की सत्ता संभालने जा रही थी, जिसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने ‘कट्टर’ और ‘फासीवादी’ जैसे न जाने कितने विशेषणों से नवाजा था। लेकिन जब उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली, तो वैश्विक राजनीति का रुख ही बदल कर रख दिया। हम बात कर रहे हैं इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की।

मेलोनी का यहाँ तक पहुँचने का सफर किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। बचपन में पिता का साथ छूटना, स्कूल में गंभीर बुलिंग का शिकार होना, और तंगी के दिनों में नाइट क्लबों में बारटेंडर से लेकर दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करने तक मेलोनी ने फर्श से अर्श तक का सफर तय किया है। आइए जानते हैं उनकी इस प्रेरणादायक जीवन यात्रा और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी खास बॉन्डिंग के पीछे की असल वजह।

1. बचपन का संघर्ष: पिता का धोखा और आर्थिक तंगी

जॉर्जिया मेलोनी का जन्म 15 जनवरी 1977 को रोम के एक साधारण परिवार में हुआ था। जब वह महज 11 साल की थीं, तब उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया। उनके पिता फ्रांसिस्को मेलोनी (जो पेशे से अकाउंटेंट थे) अपनी पत्नी और दो मासूम बेटियों—जॉर्जिया और एरियाना—को छोड़कर हमेशा के लिए कैनरी आईलैंड चले गए।

घर में दाने-दाने के लाले पड़ गए थे। उनकी मां, अन्ना पेराटोरे ने अपनी बेटियों को पालने के लिए दिन-रात एक कर दिया और घर चलाने के लिए रोमांटिक नॉवेल्स लिखना शुरू किया। जॉर्जिया ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि पिता के इस धोखे ने उनके भीतर खुद के पैरों पर खड़े होने की एक जिद्द पैदा कर दी थी।

स्कूल में झेली भयानक ‘बुलिंग’

बचपन में जॉर्जिया मेलोनी का वजन थोड़ा ज़्यादा था। इसके कारण स्कूल में उन्हें बच्चे ‘मोटी’ कहकर बुरी तरह चिढ़ाते और बुली करते थे। गार्बाटेला की तंग गलियों और स्कूल के इन कड़वे अनुभवों ने मेलोनी को सिखा दिया कि अगर दुनिया का सामना करना है, तो खुद को पत्थर की तरह मजबूत बनाना होगा।

2. 15 साल की उम्र में राजनीति में कदम 

साल 1992 में इटली की राजनीति भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई थी और बड़े-बड़े नेता जेल जा रहे थे। इसी उथल-पुथल के बीच, महज 15 साल की उम्र में जॉर्जिया मेलोनी ने ‘यूथ फ्रंट’ का दामन थामा। यह ‘इतालवी सोशल मूवमेंट’ (MSI) नाम की पार्टी का युवा विंग था, जिसकी स्थापना पूर्व तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी के समर्थकों ने की थी। यही कारण है कि आज भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया मेलोनी को इसी पृष्ठभूमि के जरिए घेरने की कोशिश करता है।

मेलोनी ने किए ‘ऑड जॉब्स’

पैसे की तंगी के बावजूद राजनीति में टिके रहने के लिए मेलोनी ने कई छोटे-मोटे काम किए:

  • रोम के मशहूर नाइट क्लबों में बारटेंडर के रूप में काम किया।
  • लोगों के घरों में जाकर बच्चों को संभालने यानी ‘नैनी’ का काम किया।
  • पब और रेस्टोरेंट में वेट्रेस के रूप में सर्विस दी।

आज जो महिला G-7 देशों के शक्तिशाली राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के साथ वैश्विक मंच साझा करती हैं, वह कभी लोगों को ड्रिंक्स सर्व करती थीं और बच्चों के डायपर बदलती थीं। इसी जमीनी दौर ने उन्हें आम गरीब नागरिकों की नब्ज पकड़ना सिखाया।

3. सबसे कम उम्र की मंत्री का रिकॉर्ड

छात्र राजनीति से निकलकर मेलोनी ने जल्द ही मुख्यधारा की राजनीति में अपनी धाक जमा ली।

  • 2006: महज 29 साल की उम्र में मेलोनी ने इटली के संसद के निचले सदन का चुनाव जीता और सांसद बनीं।
  • 2008: इटली के कद्दावर नेता सिल्वियो बर्लुस्कोनी की सरकार में उन्हें युवा मामलों का मंत्री नियुक्त किया गया। इसके साथ ही वह इटली के इतिहास में सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री बन गईं।

सिद्धांतों से समझौता नहीं

मंत्री रहते हुए बीजिंग ओलंपिक के दौरान जब चीन ने तिब्बत पर पाबंदियां लगाईं, तो मेलोनी ने खुलेआम इतालवी एथलीटों से इस ओलंपिक का बहिष्कार करने की अपील कर दी। उनकी अपनी ही सरकार के प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी इस बयान से असहज हुए, लेकिन मेलोनी अपने फैसले पर अडिग रहीं।

4. 2% वोट से सत्ता के शिखर तक 

साल 2011 में बर्लुस्कोनी सरकार गिरने के बाद मेलोनी ने एक ऐसा राजनीतिक जुआ खेला जिसे विश्लेषकों ने आत्मघाती बताया। उन्होंने 2012 में अपनी पुरानी पार्टी छोड़कर कुछ साथियों के साथ मिलकर एक नई दक्षिणपंथी पार्टी बनाई Fratelli d’Italia (ब्रदर्स ऑफ इटली)

  • 2013 के चुनाव: पार्टी को देश भर में महज 2 फीसदी वोट मिले। आलोचकों ने कहा कि मेलोनी का करियर खत्म हो चुका है।
  • रणनीति: मेलोनी ने हार नहीं मानी। अगले 10 सालों तक उन्होंने अवैध प्रवासियों के खिलाफ मोर्चा खोला, यूरोपीय संघ की उन नीतियों का विरोध किया जो स्थानीय व्यापारियों को नुकसान पहुंचा रही थीं, और पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों व संस्कृति को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। उनका नारा था “ईश्वर, मातृभूमि और परिवार”
  • 2018 से 2022: जो पार्टी कभी 2% पर थी, वह 2018 में 4% और फिर 2022 के चुनाव में एक बड़ी राजनीतिक सुनामी में बदल गई।

मेलोनी ने चुनाव प्रचार के दौरान अपना प्रसिद्ध नारा दिया

“मैं जॉर्जिया हूं, मैं एक महिला हूं, मैं एक मां हूं, मैं एक ईसाई हूं।”

इस व्यक्तिगत ब्रांडिंग की तुलना भारत में 2019 के चुनाव में चले नारे मोदी है तो मुमकिन है” से की जा सकती है। अंततः 22 अक्टूबर 2022 को मेलोनी ने इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

5. निजी जीवन की चुनौतियां और गरिमा

इस मुकाम तक पहुंचने के लिए मेलोनी ने कई निजी कुर्बानियां भी दीं। अक्टूबर 2023 में, उन्हें अपनी बेटी के पिता और अपने लॉन्ग-टर्म पार्टनर एंड्रिया जियाम्ब्रुनो से अलग होना पड़ा, जब उनके पार्टनर के कुछ आपत्तिजनक ऑडियो और बयान मीडिया में लीक हो गए। मेलोनी ने इस मुश्किल वक्त में भी अपनी गरिमा बनाए रखी और बिना झुके रिश्ते को खत्म करने का साहसिक फैसला लिया।

6. मेलोनी और मोदी का ‘कनेक्शन’ 

भारत में जॉर्जिया मेलोनी की लोकप्रियता किसी हॉलीवुड स्टार से कम नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी गहरी दोस्ती और सोशल मीडिया पर #Melodi का ट्रेंड होना इस बात का प्रमाण है। दोनों नेताओं के बीच इस मजबूत तालमेल के पीछे कई बेहद दिलचस्प समानताएं हैं:

  • जमीनी संघर्ष: पीएम मोदी की तरह ही जॉर्जिया मेलोनी का बचपन भी घोर गरीबी और संघर्षों में बीता है। दोनों ही नेता बिना किसी गॉडफादर के, बेहद साधारण पृष्ठभूमि से उठकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचे हैं।
  • राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी विचारधारा: दोनों नेता दक्षिणपंथी विचारधारा वाली पार्टियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और अपनी संस्कृति, धर्म व पारंपरिक मूल्यों को प्राथमिकता देते हैं।
  • विदेशी मीडिया का निशाना: दोनों ही नेताओं को उनके शुरुआती करियर में अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा ‘कट्टर’ और ‘विवादास्पद’ बताकर बदनाम करने की कोशिश की गई, लेकिन दोनों ने ही अपने काम और लोकप्रियता से वैश्विक मंच पर अपनी एक मजबूत और अपरिहार्य पहचान बनाई।
  • सत्ता से सीधा मुकाबला: मेलोनी ने जहां युवावस्था में इटली की स्थापित व्यवस्था के खिलाफ प्रदर्शन किए, वहीं पीएम मोदी ने भारत में इमरजेंसी के दौर में भूमिगत रहकर सत्ता के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया था।

गार्बाटेला की तंग गलियों से निकलकर रोम के प्रधानमंत्री आवास और फिर वैश्विक पटल पर भारत के साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी बनाने तक, जॉर्जिया मेलोनी की यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे पक्के हों, तो दुनिया की कोई भी बुलीइंग या तंगी आपका रास्ता नहीं रोक सकती।

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