पश्चिम बंगाल: गौवंश संरक्षण कानून पर वामपंथियों को क्यों लगी मिर्ची? CPI-ML की याचिका ने खोला ‘दोहरा चेहरा’
कोलकाता: पश्चिम बंगाल, जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और माँ दुर्गा की पावन आराधना के लिए विश्व विख्यात है, आज राजनीतिक तुष्टिकरण और वैचारिक संघर्ष का केंद्र बन गया है। राज्य की भाजपा सरकार द्वारा ‘पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम, 1950’ को सख्ती से लागू करने के निर्णय ने राज्य के ‘लिबरल’ और ‘वामपंथी’ खेमे में हलचल मचा दी है।
कानून का पालन या ‘मजहबी एजेंडा’?
राज्य सरकार ने 13 मई 2026 को एक नोटिस जारी कर दशकों पुराने कानून को धरातल पर उतारने का निर्देश दिया। लेकिन अर्बन नक्सलियों और वामपंथी ब्रिगेड को इसमें जनहित के बजाय राजनीति दिखने लगी है। CPI-ML (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने इस कानून की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वामपंथियों का तर्क है कि यह कानून एक विशेष समुदाय की ‘आजादी’ और ‘भोजन के अधिकार’ का उल्लंघन है।
क्या है 1950 का वह कानून जिसे लेकर मचा है बवाल?
यह समझना आवश्यक है कि सरकार ने कोई नया कानून नहीं बनाया है, बल्कि 1950 के मौजूदा अधिनियम को ही कड़ाई से लागू किया है। इस कानून के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- फिटनेस सर्टिफिकेट अनिवार्य: किसी भी गाय, बैल, बछड़े या भैंस का वध करने से पहले आधिकारिक ‘फिटनेस सर्टिफिकेट’ प्राप्त करना अनिवार्य है।
- उम्र की सीमा: वध के लिए सर्टिफिकेट तभी जारी किया जाएगा जब पशु की आयु 14 वर्ष से अधिक हो, या वह गंभीर रूप से बीमार/अपाहिज हो।
- सार्वजनिक वध पर रोक: सड़कों या सार्वजनिक स्थानों पर सरेआम पशु वध को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है।
- दंड का प्रावधान: नियमों का उल्लंघन करने पर 6 महीने की जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है।
वामपंथ का ‘धार्मिक’ हृदय परिवर्तन?
दिलचस्प बात यह है कि जो वामपंथी दल दशकों तक धर्म को ‘अफीम’ बताकर खारिज करते रहे, आज वही वोट बैंक की राजनीति के लिए ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ की दुहाई दे रहे हैं। CPI-ML की याचिका में दावा किया गया है कि इससे किसानों की रोजी-रोटी और एक समुदाय के खान-पान पर हमला होगा।
तथ्य की बात: सरकार का तर्क है कि यह कानून दुधारू पशुओं की रक्षा और बंगाल की ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए है। स्वस्थ गौवंश ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, और उनकी रक्षा करना संवैधानिक कर्तव्यों का हिस्सा है।
कोर्ट में होगी अगली सुनवाई
कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सुजॉय पॉल और जदस्टिस पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ अब इस मामले पर सुनवाई करेगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जब कानून 1950 से अस्तित्व में है, तो इसे लागू करना प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है, न कि किसी मौलिक अधिकार का हनन।
निष्कर्ष: जनता के सामने बेनकाब होता दोहरा चेहरा
बंगाल की राजनीति आज उस मोड़ पर है जहाँ एक तरफ कानून का राज स्थापित करने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी तरफ ‘खान-पान’ की आड़ में अराजकता को संरक्षण देने का प्रयास। क्या गौवंश की रक्षा करना और सरेआम हिंसा को रोकना किसी की व्यक्तिगत आजादी में हस्तक्षेप है? या फिर यह वामपंथियों के उस पुराने ‘इकोसिस्टम’ को बचाने की आखिरी छटपटाहट है, जिसने वर्षों तक बंगाल की संस्कृति को चोट पहुँचाई है?
इसका फैसला अब अदालत और बंगाल की जनता की अदालत, दोनों को करना है।
