बंगाल चुनाव के बाद बिखर गया ‘INDIA गठबंधन’, कांग्रेस-लेफ्ट ने नहीं दिया ममता का साथ

0
thumbnail-1778504201066

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी ‘अजेय’ मानी जाने वाली ममता बनर्जी आज अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही हैं। जिस सत्ता के शिखर पर रहते हुए वे विरोधियों को तिनके के बराबर समझती थीं, आज वही ममता बनर्जी राजनीतिक गलियारों में समर्थन के लिए जद्दोजहद करती नजर आ रही हैं। 15 साल का ‘तृणमूल साम्राज्य’ आखिर कैसे ताश के पत्तों की तरह ढह गया, यह आज भारतीय राजनीति में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है।

बंगाल की राजनीति का ‘ऐतिहासिक’ बदलाव

वक्त का पहिया कितनी तेजी से घूमता है, इसका अंदाजा 9 मई की तारीख से लगाया जा सकता है। यह दिन ममता बनर्जी के लिए किसी बुरे सपने (Nightmare) से कम नहीं रहा। जब शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) ने पश्चिम बंगाल के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली, तो न केवल टीएमसी (TMC) के पैरों तले जमीन खिसक गई, बल्कि राज्य की सत्ता संरचना में एक बड़ा बदलाव आया। डेढ़ दशक तक बंगाल की सत्ता पर काबिज रहने वाली टीएमसी आज हाशिए पर खड़ी है।

साथियों से ममता की अपील

चुनाव से पहले ममता बनर्जी के तेवर काफी सख्त थे। उन्होंने ‘एकला चलो’ का नारा बुलंद किया था और कांग्रेस व वामपंथियों को बंगाल से उखाड़ फेंकने की कसम खाई थी। लेकिन सत्ता हाथ से जाते ही दीदी के सुर पूरी तरह बदल गए हैं। हार की कड़वाहट और राजनीतिक वजूद बचाने की चुनौती ने उन्हें फिर से ‘INDIA गठबंधन’ की याद दिला दी है। अब वे भाजपा को हराने के लिए वामपंथियों और ‘अल्ट्रा-लेफ्ट’ तक से साझा मंच बनाने की गुहार लगा रही हैं।

साथियों ने दिखाया ठेंगा

ममता बनर्जी की इस अपील पर उनके पुराने प्रतिद्वंद्वियों ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। सीपीआईएम (CPM) के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम ने ममता की इस पेशकश को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक ‘करारा तमाचा’ जड़ा है। सलीम ने स्पष्ट किया कि उन्हें ऐसा कोई भी प्रस्ताव मंजूर नहीं है जिसकी पहचान “अपराधी, लुटेरी, भ्रष्ट और सांप्रदायिक” हो। उन्होंने कहा कि वामपंथ हमेशा जनता और कमजोर वर्ग के साथ खड़ा रहेगा, न कि अवसरवादी राजनीति के साथ।

कांग्रेस ने भी छोड़ा ‘दीदी’ का साथ

सिर्फ वामपंथी ही नहीं, बल्कि INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने भी ममता बनर्जी से पल्ला झाड़ लिया है। कांग्रेस प्रवक्ता सौम्या रॉय ने ममता बनर्जी के ‘न्योते’ पर हैरानी जताते हुए पूछा कि आखिर ‘अल्ट्रा-लेफ्ट’ से उनका क्या तात्पर्य है? राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तमिलनाडु में गठबंधन की बदलती स्थितियों को देखते हुए कांग्रेस अब ममता बनर्जी का साथ देकर अपनी बची-कुची साख दांव पर नहीं लगाना चाहती।

बंगाल के चुनावी नतीजों के बाद एक अजीबोगरीब मंजर देखने को मिला। भाजपा की जीत पर कांग्रेस और लेफ्ट के कार्यकर्ताओं ने भी जश्न मनाया। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बंगाल की जनता और विपक्षी दल ममता बनर्जी के शासन को ‘तानाशाही’ के रूप में देख रहे थे।

यूपी में बढ़ी अखिलेश यादव की बेचैनी

ममता बनर्जी की इस हार और गठबंधन के बिखराव का असर केवल बंगाल तक सीमित नहीं है। इसकी आंच उत्तर प्रदेश तक पहुंच गई है। 2027 में वापसी का सपना देख रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के लिए यह एक चेतावनी है। जानकारों का कहना है कि अगर बंगाल की तरह यूपी में भी कांग्रेस ने ‘एकला चलो’ की राह पकड़ी, तो अखिलेश यादव की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

विपक्ष की आंतरिक कलह और ममता बनर्जी का गिरता ग्राफ भाजपा के लिए रिकॉर्ड तोड़ बहुमत का रास्ता साफ कर रहा है। अगर विपक्षी दल एकजुट होने के बजाय एक-दूसरे को नीचा दिखाने की राजनीति करते रहे, तो 2027 की राह उनके लिए और भी कठिन हो जाएगी।

Leave a Reply

What’s next

Discover more from Detail News India

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading