जंतर-मंतर पर ‘टूलकिट’ एक्टिव! सोनम वांगचुक के अनशन में पहुंचे चंद्रशेखर रावण का दावा- ’19 जुलाई को गिर जाएगी मोदी सरकार’
जंतर-मंतर पर इस वक्त जो सियासी तमाशा चल रहा है, उसे देखकर किसी भी आम नागरिक का खून खौलना लाजिमी है। प्रदर्शन के नाम पर दिल्ली के दिल में जो खिचड़ी पकाई जा रही है, वो अब बेहद संवेदनशील और खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। यह कोई आम या गैर-राजनीतिक प्रदर्शन नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसा अखाड़ा बन चुका है जहां देश के तमाम हताश और निराश नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए कतार में खड़े हैं। हर कोई इस बहती गंगा में हाथ धोने को तैयार बैठा है और अपना एक अलग झूठा नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहा है।
इसी बीच, भीम आर्मी के चीफ और सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ का एक ऐसा हैरान करने वाला बयान सामने आया है, जिसने न सिर्फ देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि CJP और इस पूरे प्रदर्शन के पीछे छिपी गंदी नीयत का भी पर्दाफाश कर दिया है।
वांगचुक के अनशन में पहुंचे रावण का भड़काऊ दावा
दरअसल, लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे हैं। मुद्दा चाहे जो भी हो, लेकिन वहां जिस तरह के चेहरों का जमावड़ा लग रहा है, वह कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर रावण भी वांगचुक के अनशन को समर्थन देने पहुंचे थे, लेकिन इस दौरान उन्होंने मौके का सियासी फायदा उठाने की पूरी कोशिश की।
लेफ्ट विंग (वामपंथी) के नेताओं की मौजूदगी में चंद्रशेखर रावण ने एक ऐसा भड़काऊ और चौंकाने वाला दावा कर दिया कि वहां उपस्थित हर कोई दंग रह गया। चंद्रशेखर ने खुलेआम मीडिया और जनता के सामने दावा किया कि आने वाली 19 जुलाई तक केंद्र की मोदी सरकार गिर जाएगी।
लोकतांत्रिक जनादेश का सरेआम अपमान
चंद्रशेखर रावण का यह बयान लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार को अस्थिर करने की ओर इशारा करता है। देश की जनता ने भारी बहुमत देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए (NDA) को सत्ता सौंपी है। संसद में सरकार के पास स्पष्ट और पूर्ण बहुमत है, देश में कानून का राज है, लेकिन इसके बावजूद रावण जैसे नेता सरेआम मंचों से सरकार गिराने की तारीखें मुकर्रर कर रहे हैं। यह बयान सीधे-सीधे भारत के लोकतंत्र का अपमान है, भारतीय संविधान का मज़ाक है और देश के करोड़ों मतदाताओं के फैसले को एक खुली चुनौती है।
NEET मुद्दे की आड़ में ‘शाहीन बाग’ पार्ट-2 की तैयारी?
यहाँ सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह उठता है कि क्या यह सिर्फ एक नेता का बड़बोलापन है, या फिर इसके पीछे देश को सुलगाने की कोई बहुत बड़ी अंतर्राष्ट्रीय या आंतरिक साजिश काम कर रही है? क्या NEET परीक्षा के संवेदनशील मुद्दे की आड़ में सरकार के खिलाफ कोई बहुत बड़ा षड्यंत्र रचा जा रहा है? जिस NEET परीक्षा पर लाखों छात्रों का भविष्य और मेहनत टिकी है, क्या उस मुद्दे को ये राजनीतिक गिद्ध अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या देश में एक बार फिर शाहीन बाग या किसान आंदोलन जैसी ‘टूलकिट’ के जरिए माहौल बिगाड़ने की कोई बड़ी प्लानिंग बैकग्राउंड में चल रही है?
‘ए-पॉलिटिकल’ नहीं, पूरी तरह स्पॉन्सर्ड है यह तमाशा
चंद्रशेखर रावण के इस बयान से यह साफ हो चुका है कि जंतर-मंतर पर चल रहा यह तमाशा बिल्कुल भी ‘ए-पॉलिटिकल’ यानी गैर-राजनीतिक नहीं है। यह पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित और प्रायोजित (Sponsored) है, जिसके पीछे एक बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति काम कर रही है। जो लोग चुनाव के मैदान में सीधे तौर पर मोदी सरकार को हराने में नाकाम रहे, वो अब पिछले दरवाजे से आंदोलनों को हाईजैक करके, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के पीछे छिपकर देश को अराजकता की आग में झोंकना चाहते हैं।
वामपंथियों और विपक्ष के इन तमाम नेताओं का जंतर-मंतर पर जुटना साफ बताता है कि इन्हें न तो लद्दाख की चिंता है और न ही इन्हें NEET के पीड़ित छात्रों के भविष्य से कोई लेना-देना है। इन्हें सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी की कुर्सी से नफरत है। और इसी नफरत में अंधे होकर ये इस हद तक गिर चुके हैं कि अब सरकार गिराने के दावे कर रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियों को जांच करने की जरूरत
देश की सुरक्षा एजेंसियों को चंद्रशेखर रावण के इस बयान को बेहद गंभीरता से लेना चाहिए। जब एक जिम्मेदार पद पर बैठा राजनीतिक दल का मुखिया सरेआम यह कहता है कि सरकार गिर जाएगी, तो इसका मतलब साफ है कि पर्दे के पीछे कोई बहुत बड़ा खेल चल रहा है।
आखिर रावण के इस दावे का असली सच क्या है? आज देश के नागरिकों को यह तय करना होगा कि क्या हम इन अराजक तत्वों के हाथों अपने लोकतंत्र को बंधक बनने देंगे? क्या हम इन नेताओं को अपने देश का माहौल बिगाड़ने की इजाजत देंगे, जो सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं? सरकारें वोटों से बनती हैं और वोटों से ही बदलती हैं; जंतर-मंतर पर खड़े होकर धमकियां देने से सरकारें नहीं गिरा करतीं।
