131वां संविधान संशोधन विधेयक: विपक्षी गठबंधन ‘INDI’ में महा-विस्फोट! शरद पवार के एक फैसले से संकट में राहुल गांधी की लीडरशिप
भारतीय राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं। संसद के आगामी मॉनसून सत्र से पहले एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने विपक्षी गठबंधन ‘INDI’ की बुनियादी एकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा तेज है कि क्या कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के नेतृत्व को अब तक का सबसे बड़ा और करारा झटका लगने जा रहा है?
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, 131वां संविधान संशोधन विधेयक यानी वह ऐतिहासिक महिला आरक्षण और परिसीमन (Delimitation) बिल, जिसे पिछले सत्र में गिराने के लिए विपक्ष ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था उसे संसद से पास कराने के लिए अब शरद पवार की पार्टी NCP (Sharadchandra Pawar) मोदी सरकार का साथ दे सकती है। इस संभावित यू-टर्न के बाद से ही कांग्रेस खेमे में हड़कंप मच गया है और ‘INDI’ गठबंधन बिखरने की कगार पर पहुंचता दिख रहा है।
राहुल गांधी की लीडरशिप पर करारा तमाचा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शरद पवार की पार्टी का यह कदम महज एक बिल का समर्थन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर राहुल गांधी की लीडरशिप को एक बड़ी चुनौती है। काफी समय से राहुल गांधी खुद को इस विपक्षी मोर्चे के निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। हालांकि, हालिया समय में बंगाल में टीएमसी और तमिलनाडु में डीएमके के साथ समन्वय को लेकर उठे सवालों के बीच, अब उनके अपने ही सबसे बड़े सहयोगी दल के भीतर से आई इस खबर ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शरद पवार जैसा मंझा हुआ और अनुभवी राजनेता कांग्रेस की रणनीति से अलग जाकर बीजेपी की विधायी योजना का हिस्सा बनने को तैयार हो रहा है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि विपक्षी एकजुटता का चक्रव्यूह पूरी तरह ढह चुका है। इसे राहुल गांधी के लिए एक बड़े राजनीतिक सरेंडर के रूप में देखा जा रहा है।
क्या है 131वें संविधान संशोधन विधेयक का असली खेल?
इस पूरे सियासी ड्रामे के केंद्र में 131वां संविधान संशोधन विधेयक है। गौरतलब है कि इसी साल अप्रैल के महीने में सरकार इस बिल को लोकसभा में लेकर आई थी, जिसका प्राथमिक उद्देश्य देश में जल्द से जल्द महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना और नए परिसीमन को हरी झंडी देना था। उस समय विपक्ष ने एकजुट होकर इस बिल को तकनीकी रूप से लोकसभा में गिरा दिया था, जिसके बाद राहुल गांधी और पूरे विपक्ष ने इसे अपनी एक बड़ी व्यक्तिगत और रणनीतिक जीत के रूप में प्रचारित किया था।
लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। मॉनसून सत्र में सरकार इस बिल को दोबारा लाने की तैयारी में है। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के जादुई आंकड़े को हासिल करने के लिए बीजेपी को अतिरिक्त समर्थन की जरूरत थी, और अब इस जरूरी नंबर की चाबी शरद पवार के हाथ में नजर आ रही है। यदि शरद पवार की पार्टी संसद में इस बिल के पक्ष में वोट करती है, तो विपक्ष का अप्रैल वाला जश्न पूरी तरह बेअसर हो जाएगा।
कांग्रेस खेमे में कोहराम, अपनों को ही बताया ‘गद्दार’!
जैसे ही यह खबर मीडिया में लीक हुई, कांग्रेस नेताओं की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राशिद अल्वी ने खुले तौर पर निराशा जताते हुए कहा कि, “विपक्ष को हर हाल में एकजुट रहना चाहिए था, सहयोगियों को बीजेपी की पिच पर जाकर नहीं खेलना चाहिए।”
वहीं, पूर्व गृह मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए इसे ‘जमीर का सौदा’ और ‘गठबंधन के साथ गद्दारी’ तक करार दे दिया। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस इस वक्त इस कदर बौखलाई हुई है कि अपने ही सहयोगियों पर दबाव बनाने के लिए उन पर निशाना साध रही है। हालांकि, शरद पवार की पार्टी पर इन चेतावनियों का कोई खास असर होता नहीं दिख रहा है। राकांपा (सपा) सांसद सुप्रिया सुले ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी बिना सोचे-समझे नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर बातचीत कर रही है।
‘वर्षा’ बंगले की सीक्रेट मीटिंग और परदे के पीछे की क्रोनोलॉजी
इस पूरे घटनाक्रम के तार मुंबई से भी जुड़े हुए हैं। एक तरफ जहां दिल्ली में कांग्रेस और राहुल गांधी सरकार को घेरने की रणनीति बनाने में व्यस्त थे, वहीं दूसरी तरफ मुंबई में मुख्यमंत्री आवास ‘वर्षा’ पर देर रात तक गुप्त बैठकें चल रही थीं। राकांपा (सपा) नेता जयंत पाटिल और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बीच हुई हालिया मुलाकातों ने पहले ही यह इशारा कर दिया था कि परदे के पीछे कोई बहुत बड़ा राजनीतिक गेम प्लान तैयार किया जा चुका है। यदि यह बिल संसद से पास हो जाता है, तो यह न केवल देश की चुनावी राजनीति की दशा और दिशा बदलेगा, बल्कि राहुल गांधी के उस राजनीतिक नैरेटिव को भी ध्वस्त कर देगा जिसके दम पर वह खुद को विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा बताते हैं। जो नेता अपने गठबंधन के सबसे बड़े सहयोगियों को साधकर नहीं रख पा रहा, उस पर जनता कितना भरोसा करेगी, यह एक बड़ा सवाल बन गया है।
