चमचागिरी की हद पार! अब अखिलेश यादव बने “भगवान श्रीकृष्ण”, विपक्ष के इस नए ट्रेंड पर भड़का सनातनी समाज

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Akhilesh Yadav Birthday: देश की राजनीति में एक नया और बेहद विवादित ट्रेंड शुरू हो गया है राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए हिंदू देवी-देवताओं के अपमान का ट्रेंड। राजनीतिक पार्टियों के कुछ अति-उत्साही समर्थकों ने चाटुकारिता में मर्यादा की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। कभी कोई कार्यकर्ता अपने नेता को भगवान का अवतार घोषित कर देता है, तो कोई नेता की तस्वीर के सामने इस तरह हवन-पूजन करता है जैसे वो कोई साक्षात ईश्वर हों। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के बाद अब समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव के समर्थक भी इसी विवादित रास्ते पर आगे बढ़ चुके हैं। सपा कार्यकर्ताओं के एक हालिया कारनामे ने देश के सनातनी समाज को झकझोर कर रख दिया है, जहां उन्होंने अपने नेता को सीधे भगवान “श्रीकृष्ण” के रूप में पेश कर दिया है।

जन्मदिन पर पार हुईं मर्यादा की सीमाएं

दरअसल, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का जन्मदिन है और वह 53 बरस के हो गए हैं। इस अवसर पर कार्यकर्ताओं में अपने नेता को लेकर उत्साह होना स्वाभाविक है, लेकिन सपा कार्यकर्ताओं ने इस बार हिंदू आस्था को पूरी तरह तार-तार कर दिया। उन्होंने अखिलेश यादव की तुलना सीधे द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण से कर दी।

सपा प्रमुख के जन्मदिन पर उनके समर्थकों ने बकायदा एक हवन-पूजन का कार्यक्रम आयोजित किया था। इसी दौरान वहां अखिलेश यादव का एक विशाल पोस्टर लगाया गया, जिसने पूरे विवाद को जन्म दिया। इस पोस्टर में अखिलेश यादव को हूबहू भगवान श्रीकृष्ण के रूप में दिखाया गया है। जिस तरह भगवान कृष्ण के हाथों में सुदर्शन चक्र होता है, ठीक उसी मुद्रा में पोस्टर के भीतर अखिलेश यादव अपने दोनों हाथों में ‘संविधान की कॉपी’ पकड़े हुए दिखाई दे रहे हैं।’

क्या ये आराध्य का मज़ाक नहीं?

इस पोस्टर के सामने आते ही सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बड़ा बवाल खड़ा हो गया है। लोग लगातार समाजवादी पार्टी को घेर रहे हैं और पूछ रहे हैं कि क्या ये भगवान श्रीकृष्ण का सीधा अपमान नहीं है? क्या अपनी राजनीति की रोटियां सेकने के लिए हमारे आराध्यों का इस तरह मज़ाक उड़ाना जायज है? क्या संविधान बचाने का ढोंग रचने के लिए विपक्ष को सिर्फ भगवान कृष्ण की छवि ही मिली थी?

इस हरकत का वीडियो जैसे ही इंटरनेट पर वायरल हुआ, लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। एक यूजर ने कमेंट बॉक्स में लिखा, इस देश में पागलपन और चाटुकारिता की कोई हद नहीं बची है।” वहीं, एक दूसरे यूजर ने अखिलेश यादव पर तंज कसते हुए लिखा, “अगर भगवान कृष्ण बनाया ही था, तो उनके एक हाथ में टोटी भी दे देनी चाहिए थी, ताकि उनका असली रूप सामने आ सके।”

राहुल गांधी को भी बनाया जा चुका है ‘भगवान परशुराम’

विपक्ष के नेताओं को भगवान का स्वरूप देने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी के जन्मदिन पर भी ऐसा ही तमाशा किया था। वाराणसी के पवित्र घाट पर एक पोस्टर लगाया गया था, जिसमें राहुल गांधी को भगवान ‘परशुराम’ के रूप में दिखाया गया था।

यहाँ गंभीर सवाल यह उठता है कि जो नेता उत्तर से लेकर दक्षिण तक सनातन धर्म पर सवाल उठाने वाले बयानों पर अक्सर चुप्पी साध लेते हैं, या जिनके सहयोगी दल सनातन को ‘बीमारी’ बताकर मिटाने की बात करते हैं, उन्हीं नेताओं को उनके चमचे कभी परशुराम तो कभी श्रीकृष्ण का अवतार बना देते हैं। अपनी सियासत चमकाने के लिए किसी भी हद तक जाने वाले इन राजनेताओं को भगवान का दर्जा क्यों दिया जा रहा है? राम मंदिर के मुद्दे पर सुर्खियां बटोरने की कोशिश करने वाले अखिलेश यादव ने आखिर अपने समर्थकों की इस हरकत पर अब तक लगाम क्यों नहीं लगाई?

सिर्फ सनातन धर्म के साथ ही ऐसा खिलवाड़ क्यों?

इस पूरे मामले ने एक और गंभीर बहस को हवा दे दी है। सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी, कांग्रेस या देश की किसी भी दूसरी तथाकथित ‘सेकुलर’ पार्टी के कार्यकर्ताओं में इतनी हिम्मत है कि वो अपने नेताओं की ऐसी तुलना किसी दूसरे धर्म के पूजनीय प्रतीकों या पैगंबरों से कर सकें? क्या ये कार्यकर्ता अपने नेताओं को किसी दूसरे मजहब के ईश्वर का रूप दे सकते हैं?

जवाब साफ़ है बिलकुल नहीं। लेकिन चूंकि मामला हिंदुओं का है, सनातन धर्म का है, इसलिए यहाँ सब कुछ जायज मान लिया जाता है। हिंदुओं को सहिष्णु समझकर उनकी भावनाओं के साथ बार-बार खिलवाड़ किया जाता है। कभी हमारे देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणियां की जाती हैं, तो कभी नेताओं को ही भगवान बनाकर पूजने का नया ढोंग शुरू कर दिया जाता है।

अस्तित्व पर आ जाएगा खतरा

राजनीतिक पार्टियों को अब यह साफ-साफ समझना होगा कि नेताओं की अंधभक्ति और चमचागिरी के चक्कर में सनातन संस्कृति का अपमान अब यह देश बर्दाश्त नहीं करेगा। राजनीति, विचारधारा और चुनाव अपनी जगह हैं, लेकिन जब राजनीति हमारी आस्था की पवित्र सीमाओं को लांघने लगे, तो समाज को पूरी ताकत से आवाज़ उठानी ही होगी। नेताओं को भी अपने कार्यकर्ताओं की इन हरकतों पर सख्त ऐक्शन लेना होगा, नहीं तो जो पार्टियां पहले से सत्ता से बाहर हैं, भविष्य में उनका राजनीतिक अस्तित्व भी पूरी तरह खतरे में आ जाएगा।

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