PM Modi Australia Visit: भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम डील से उड़ी पाकिस्तान की नींद, चीन भी हैरान; जानिए पूरा मामला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी विदेशी दौरों पर जाते हैं, तो भारत के कूटनीतिक और रणनीतिक हितों के लिए कोई बड़ी कामयाबी लेकर लौटते हैं। हाल ही में पीएम मोदी की तीन देशों की यात्रा संपन्न हुई, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक रूप से खास रहा उनका ऑस्ट्रेलिया दौरा। इस दौरे के दौरान भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए समझौतों ने न केवल पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ा दी हैं, बल्कि बीजिंग (चीन) में भी खलबली मचा दी है।
इस ऐतिहासिक समझौते के बाद रक्षा गलियारों में यह चर्चा तेज है कि भारत की बढ़ती परमाणु और कूटनीतिक ताकत के आगे अब विरोधियों की मनमानी नहीं चलने वाली। आइए जानते हैं कि जो ऑस्ट्रेलिया कभी भारत को यूरेनियम देने से साफ मना करता था, वह आज भारत के साथ इस बड़ी डील के लिए कैसे तैयार हुआ।
2010 का ‘नो मतलब नो’ और आज का बदला हुआ परिदृश्य
बात बहुत पुरानी नहीं है, साल 2010 के आसपास की है। उस समय ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम बेचने के मुद्दे पर सीधे मुंह बात करने को भी तैयार नहीं था। भारत जब भी अपनी असैन्य ऊर्जा (Civil Energy) आवश्यकताओं के लिए ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की मांग करता, तो उनका एक ही रूखा जवाब होता था ‘नो मतलब नो!’
ऑस्ट्रेलिया का तर्क था कि चूंकि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए वे भारत को यूरेनियम की आपूर्ति नहीं कर सकते। लेकिन समय बदला और वैश्विक पटल पर भारत की साख भी बदली।
2014 का टर्निंग पॉइंट
जैसे-जैसे वैश्विक मंच पर भारत की अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता का लोहा माना जाने लगा, वैसे-वैसे ऑस्ट्रेलिया को भी अपनी पुरानी जिद छोड़नी पड़ी। साल 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद कूटनीतिक समीकरण तेजी से बदले।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी एबॉट के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ताओं और मजबूत कूटनीति का नतीजा यह हुआ कि ऑस्ट्रेलिया को झुकना पड़ा। जो देश कभी कड़ा रुख अपनाए हुए था, उसने भारत के साथ ‘असैन्य परमाणु समझौते’ (Civil Nuclear Deal) पर हस्ताक्षर किए। हालांकि, यह पूरी प्रक्रिया इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) की कड़ी निगरानी में होती है, लेकिन भारत ने अपने स्वाभिमान और सिद्धांतों से समझौता किए बिना इस नामुमकिन मानी जाने वाली डील को मुमकिन कर दिखाया।
इंडो-पैसिफिक की जियो-पॉलिटिक्स और चीन का फैक्टर
इस पूरे रणनीतिक बदलाव के पीछे हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific Region) में चीन की बढ़ती आक्रामकता और दादागिरी एक बड़ा कारण रही है। चीन के विस्तारवाद और व्यापारिक प्रतिबंधों के चलते ऑस्ट्रेलिया के कूटनीतिक संबंध बीजिंग से बिगड़ने लगे थे।
ऐसे समय में कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया) को यह बखूबी अहसास हुआ कि इस क्षेत्र में चीन के दबदबे को अगर कोई देश संतुलित कर सकता है, तो वह केवल भारत है। भारत जैसा मजबूत, लोकतांत्रिक और आर्थिक रूप से गतिशील देश अब ऑस्ट्रेलिया की रणनीतिक जरूरत बन चुका है।
क्या है भारत का ‘क्रोनोलॉजी गेम’?
रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भले ही ऑस्ट्रेलिया से आयातित यूरेनियम का इस्तेमाल केवल नागरिक परमाणु रिएक्टरों (बिजली उत्पादन) के लिए किया जाएगा, लेकिन इसके रणनीतिक मायने बहुत बड़े हैं।
जैसे ही ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम भारत के सिविल न्यूक्लियर प्लांट्स में इस्तेमाल होना शुरू होगा, वैसे ही भारत का अपना घरेलू यूरेनियम भंडार (Domestic Uranium Reserve) पूरी तरह से सुरक्षित बच जाएगा। इस बचे हुए घरेलू यूरेनियम का उपयोग भारत अपने सैन्य हथियार कार्यक्रमों और रणनीतिक मिसाइल प्रणालियों के लिए पूरी स्वतंत्रता के साथ कर सकेगा। यही वह समीकरण है जिससे पाकिस्तान और चीन दोनों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
‘नो फर्स्ट यूज’ नीति और भारत का सख्त संदेश
भारत की परमाणु नीति का मूल सिद्धांत ‘नो फर्स्ट यूज’ (No First Use) है, यानी भारत किसी भी देश पर पहले परमाणु हमला नहीं करेगा। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत के परमाणु हथियार केवल एक ‘निवारक’ (Deterrent) के रूप में हैं ताकि दुश्मन देश किसी भी दुस्साहस से बचें। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि यदि किसी शत्रु देश ने भारत की संप्रभुता को चुनौती देने या हमला करने की कोशिश की, तो भारत का जवाबी प्रहार अत्यंत विनाशकारी होगा। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया के साथ मजबूत होते कूटनीतिक और परमाणु संबंधों ने सीमा पार बैठे आतंकियों के आकाओं की हेकड़ी पूरी तरह से हवा कर दी है। यह ‘न्यू इंडिया’ की बदलती ताकत की ही बानगी है कि आज वैश्विक शक्तियां भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार हैं।
