सीएम विजय ने परिसीमन का किया विरोध, मोदी सरकार के प्रस्तावित डीलिमिटेशन पर उठाए सवाल

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तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने एक बार फिर केंद्र सरकार के प्रस्तावित डीलिमिटेशन (परिसीमन) को लेकर अपनी स्पष्ट राय रखी है। उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के संभावित फैसले का खुलकर विरोध किया है।

डीलिमिटेशन बिल को लेकर बढ़ी चर्चा

संसद के आगामी मॉनसून सत्र में केंद्र सरकार द्वारा लोकसभा सीटों के पुनर्गठन और संभावित वृद्धि से जुड़े डीलिमिटेशन (परिसीमन) बिल को लाए जाने की चर्चाएं तेज हैं। महिला आरक्षण लागू होने के बाद लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाए जाने की संभावना जताई जा रही है।

डीलिमिटेशन के तहत देश की जनसंख्या के आधार पर लोकसभा क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व को नए सिरे से तय किया जाता है।

सीएम विजय ने क्या कहा?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शुक्रवार को करूर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने कहा कि तमिलनाडु प्रस्तावित परिसीमन को स्वीकार नहीं करेगा।

उन्होंने कहा, “तमिलनाडु परिसीमन को स्वीकार नहीं करेगा। केंद्र सरकार परिसीमन पर एक नया बिल लाने की योजना बना रही है, लेकिन इसकी शर्तें अभी स्पष्ट नहीं हैं। राज्य इस कदम को स्वीकार नहीं करेगा।”

उन्होंने आगे कहा, “जो हमारा अधिकार है, उसे कोई छीन नहीं सकता और हम किसी को ऐसा करने नहीं देंगे।”

उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

क्या है डीलिमिटेशन (परिसीमन)?

डीलिमिटेशन वह प्रक्रिया है जिसके तहत देश की जनसंख्या के अनुसार लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है, ताकि प्रत्येक सांसद लगभग समान संख्या की आबादी का प्रतिनिधित्व करे।

भारत में लोकसभा सीटों की वर्तमान संख्या 543 है, जिसका निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया था। तब देश की आबादी लगभग 55 करोड़ थी, जबकि आज यह 140 करोड़ से अधिक हो चुकी है। वर्तमान में एक सांसद औसतन 25 से 30 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।

परिसीमन क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?

संविधान के अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं की समीक्षा की जानी चाहिए। परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, ताकि तेजी से बढ़ती आबादी वाले क्षेत्रों को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सके और लोकतांत्रिक व्यवस्था अधिक संतुलित बन सके।

फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित डीलिमिटेशन की अंतिम रूपरेखा सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में इस विषय पर राजनीतिक बहस और विभिन्न राज्यों की प्रतिक्रियाएं आने वाले समय में और तेज होने की संभावना है।

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