“साले, यही औकात है तुम लोगों की…”: जंतर-मंतर पर दिल्ली पुलिस को अपशब्द और NEET आंदोलन के भटकते रास्ते
X: Abhijeet Dipke
“अभी अमित शाह का फोन आएगा तो भागते हुए जाओगे तुम, साले। यही औकात है तुम लोगों की।”
जंतर-मंतर के धरना स्थल पर हवा में तैरते ये बेहद आपत्तिजनक और तल्ख बोल किसी आम अपराधी या उपद्रवी के नहीं, बल्कि खुद को एक सामाजिक कार्यकर्ता और प्रदर्शनकारी बताने वाले अभिजीत दीपके के हैं। ये अपशब्द और तीखे वार सीधे तौर पर दिल्ली पुलिस के जवानों के लिए इस्तेमाल किए गए हैं, जो पिछले कई हफ्तों से वहां मुस्तैद हैं। लेकिन सवाल यह है कि कानून और मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाने वाला यह गुस्सा आखिर क्यों और किसलिए निकाला जा रहा है?
मुस्तैद दिल्ली पुलिस और आंदोलनकारियों का गाली-गलौज
नीट (NEET) पेपर लीक के नाम पर शुरू हुए इस कथित छात्र आंदोलन के पीछे चल रहे ‘टूलकिट’ का सच अब धीरे-धीरे परतों में बाहर आने लगा है। जिस दिल्ली पुलिस ने तकरीबन एक महीने से इन प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा और दिल्ली में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिन-रात एक कर रखा है, आज उसी वर्दी को कैमरे के सामने सरेआम अपमानित किया जा रहा है।
आलोचकों का मानना है कि यह अभद्र भाषा और आक्रामक तेवर सिर्फ एक व्यक्ति के नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे जुनैद, योगेंद्र यादव और सागरिका घोष जैसे कथित बुद्धिजीवियों और पर्दे के पीछे काम करने वाले सिंडिकेट का वरदहस्त है। देश के गृह मंत्री और दिल्ली पुलिस को लेकर दिए जा रहे ऐसे आपत्तिजनक बयान साफ दर्शाते हैं कि यह कोई शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि कैमरे के सामने अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने की एक सोची-समझी कोशिश है।
‘कैमरा-जीवी’ मानसिकता और अशांति फैलाने की मंशा
जंतर-मंतर पर चल रहे इस ड्रामे को करीब से देखने पर साफ समझ आता है कि यह पूरी तरह से एक ‘कैमरा-जीवी’ आंदोलन में तब्दील हो चुका है। जैसे ही मीडिया के कैमरे सामने आते हैं, नेताओं की एक्टिवनेस और आक्रामकता कई गुना बढ़ जाती है। प्रदर्शनकारियों का मुख्य मकसद अब छात्रों की समस्याओं का समाधान ढूंढना नहीं रह गया है, बल्कि वे जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां पैदा करना चाहते हैं जिससे जंतर-मंतर पर भारी हंगामा मचे।
इनका असली एजेंडा पुलिस को उकसाना है ताकि प्रशासन मजबूरन लाठीचार्ज या कोई सख्त कदम उठाए। इसके बाद ये अपने अंतरराष्ट्रीय टूलकिट को एक्टिव कर सकें और वैश्विक स्तर पर देश तथा सरकार को बदनाम करने का नया नैरेटिव सेट कर सकें।
दिलचस्प बात यह है कि जून की शुरुआत में जब अभिजीत दीपके अमेरिका (US) से भारत आ रहा था, तब उसने एक इंटरव्यू में सनसनी फैलाने के लिए दावा किया था कि एयरपोर्ट पर लैंड करते ही पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी। जब ऐसा कुछ नहीं हुआ, तो यह दावा किया गया कि प्रदर्शन की अनुमति न मिलने पर वे पुलिस स्टेशनों के बाहर डेरा डालेंगे। लेकिन जब वहां भी इनकी दाल नहीं गली, तो अब सरेआम गालियों का सहारा लेकर माहौल को हिंसक और तनावपूर्ण बनाने की कोशिश की जा रही है।
असली मुद्दा गया तेल लेने: NEET से ‘अडानी और उमर ख़ालिद’ तक का सफर
इस पूरे विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस ‘नीट पेपर लीक’ के मुद्दे को लेकर जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश की गई थी, वह मुद्दा अब इस पूरे प्रदर्शन से पूरी तरह गायब हो चुका है। आंदोलन का रास्ता भटकने के पैटर्न को आप इन बदलावों से समझ सकते हैं:
- एजेंडे का भटकाव: नीट के मुद्दे से शुरू होकर यह प्रदर्शन अचानक ‘ट्रांस बिल’ और ‘निकोबार प्रोजेक्ट’ जैसे असंबंधित विषयों की तरफ मुड़ गया।
- राजनीतिक नारेबाजी: प्रदर्शन के मंचों से उद्योगपति अडानी के खिलाफ नारे लगाए गए और प्रधानमंत्री मोदी को देश से भगाने जैसी भड़काऊ बातें कही गईं।
- कट्टरपंथी तत्वों की एंट्री: जेल में बंद उमर ख़ालिद को इस आंदोलन का नया नायक बना दिया गया और जेएनयू (JNU) की कुख्यात ‘ढफली गैंग’ ने वहां आकर मोर्चा संभाल लिया।
निष्कर्ष: छात्रों के नाम पर सिर्फ राजनीतिक रसूख की जंग
सौ बात की एक बात यह है कि इस आंदोलन का असली सच अब जनता के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। जिन लाखों छात्रों का भविष्य नीट परीक्षा से जुड़ा था, वे सरकार द्वारा की गई त्वरित कार्रवाई और पुनः परीक्षा के बाद अब अपने शांत भविष्य और काउंसलिंग की तैयारियों में जुट चुके हैं।
लेकिन जंतर-मंतर पर जमे इन राजनीतिक तत्वों को छात्रों के भविष्य से रत्ती भर भी लेना-देना नहीं है। यह प्रदर्शन सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी और देश के गृह मंत्री के खिलाफ अपनी राजनीतिक कुंठा निकालने और दिल्ली में अशांति का माहौल तैयार करने का एक प्रायोजित जरिया बनकर रह गया है।
