क्या समय से पहले गिर जाएगी सीएम विजय की सरकार? पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के दावे से मची खलबली
तमिलनाडु में आखिर ऐसा क्या चल रहा है… कि अचानक पूर्व मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से कह दिया—’चुनाव कभी भी हो सकते हैं… आज से ही चुनावी मोड में आ जाइए।’ क्या राहुल गांधी और कांग्रेस मिलकर मुख्यमंत्री विजय को कोई बड़ा झटका देने वाले हैं? क्या स्टालिन को पर्दे के पीछे की कोई ऐसी गुप्त जानकारी मिल गई है जो आम लोगों और राजनीतिक पंडितों को नहीं पता? क्या परदे के पीछे कोई बहुत बड़ा राजनीतिक खेल चल रहा है या फिर यह सिर्फ अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की एक सोची-समझी रणनीति है? तमिलनाडु की राजनीति में इस समय ऐसे ही कई तीखे सवाल बहुत तेज़ी से हवा में तैर रहे हैं।
3 या 6 महीने में चुनाव? स्टालिन का चौंकाने वाला दावा
द्रमुक (DMK) प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने एक सार्वजनिक मंच से यह सनसनीखेज दावा कर दिया है कि मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली टीवीके (TVK) सरकार अपना पाँच साल का कार्यकाल कभी पूरा नहीं कर पाएगी। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को पूरी तरह अलर्ट करते हुए कहा कि वे अभी से चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी शुरू कर दें। स्टालिन के मुताबिक, राज्य में नए विधानसभा चुनाव तीन महीने बाद भी हो सकते हैं, छह महीने बाद भी, या फिर किसी भी समय स्थितियां बदल सकती हैं।
विधानसभा का वो गणित, जिसने बढ़ाई सरकार की धड़कन
आखिर पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन ने अचानक इतना बड़ा दावा क्यों किया? इसके पीछे सबसे बड़ा कारण तमिलनाडु विधानसभा का मौजूदा गणित बताया जा रहा है।
तमिलनाडु विधानसभा में कुल 234 सीटें हैं और सत्ता के शीर्ष पर बने रहने यानी बहुमत के लिए कम से कम 118 विधायकों का समर्थन होना अनिवार्य है। हालिया चुनावों में थलपति विजय की पार्टी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर जरूर उभरी, लेकिन वह अपने दम पर बहुमत के आंकड़े को नहीं छू सकी और उसे केवल 108 सीटें ही मिलीं। ऐसे में सरकार बनाने और उसे चलाने के लिए विजय को कांग्रेस, आईयूएमएल (IUML), वीसीके (VCK) और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों के बाहरी समर्थन की ज़रूरत पड़ी।
स्टालिन का सीधा हमला इसी कमज़ोर कड़ी पर है। उनका दावा है कि यह सरकार अपने पैरों पर नहीं, बल्कि सहयोगियों की बैसाखियों पर टिकी हुई है। अगर आने वाले समय में राजनीतिक समीकरणों में थोड़ा भी फेरबदल हुआ, तो सरकार की स्थिरता ताश के पत्तों की तरह बिखर सकती है। इसी वजह से उन्होंने अपनी पार्टी को हर परिस्थिति के लिए 100 प्रतिशत तैयार रहने को कहा है।
चौतरफा घेरेबंदी और नए गठबंधनों की सुगबुगाहट
बात सिर्फ सरकार गिरने के दावे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि स्टालिन ने सरकार को जमीन से जुड़े कई ज्वलंत मुद्दों पर भी आड़े हाथों लिया है। उन्होंने वर्तमान सरकार को लचर कानून-व्यवस्था, गहराते बिजली संकट और उद्योगों के लगातार राज्य से बाहर जाने जैसे गंभीर विषयों पर घेरा है। उनका आरोप है कि तमिलनाडु में प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर हुआ है, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों का ग्राफ बढ़ा है और कई बड़े उद्योग अब निवेश के लिए दूसरे राज्यों की ओर रुख कर रहे हैं।
इसी बीच राज्य के एक और राजनीतिक घटनाक्रम ने इन अटकलों को और अधिक हवा दे दी है। डीएमके के पुराने और भरोसेमंद सहयोगी एमडीएमके (MDMK) ने गठबंधन छोड़ने का फैसला कर लिया है। इससे पहले कांग्रेस भी डीएमके का साथ छोड़कर विजय सरकार को अपना समर्थन दे चुकी है। इन बदलते हुए समीकरणों ने तमिलनाडु की पूरी राजनीतिक बिसात को बेहद दिलचस्प और अनिश्चित बना दिया है।
रणनीतिक दबाव या आने वाले तूफान की आहट?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या स्टालिन सिर्फ एक हताश विपक्ष के नेता की तरह अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश कर रहे हैं? या फिर उन्हें सचमुच परदे के पीछे से यह आभास हो चुका है कि विजय सरकार के सामने बहुत जल्द बहुमत का संकट खड़ा होने वाला है?
क्या तमिलनाडु की जनता को पांच साल से पहले ही एक और विधानसभा चुनाव का सामना करना पड़ेगा या फिर यह केवल सरकार पर मानसिक दबाव बनाने की एक सोची-समझी चाल है ताकि मुख्यमंत्री विजय लगातार बैकफुट पर रहें? इन सभी यक्ष प्रश्नों के वास्तविक जवाब तो आने वाले महीनों में ही साफ होंगे, लेकिन इतना बिल्कुल तय है कि तमिलनाडु की राजनीति में अब शह और मात का खेल एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है।
