क्या महात्मा गांधी को तिरंगा पसंद नहीं था? जानिए आखिर क्यों उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को सलाम करने से इनकार किया था

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महात्मा गांधी को देश की आजादी का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज जिस तिरंगे को पूरा देश गर्व के साथ सलाम करता है, उसी तिरंगे के अंतिम स्वरूप पर गांधी जी ने आपत्ति जताई थी। इतना ही नहीं, उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि यदि राष्ट्रीय ध्वज में चरखा नहीं होगा, तो वह उसे सलाम नहीं करेंगे। हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं था कि गांधी जी तिरंगे के विरोधी थे। उनका विरोध केवल उसके अंतिम डिजाइन में किए गए बदलावों को लेकर था।

22 जुलाई 1947 को अपनाया गया था राष्ट्रीय ध्वज

भारत की आजादी से कुछ सप्ताह पहले, 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज को मंजूरी दी। इस बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. भीमराव अंबेडकर, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजिनी नायडू और सी. राजगोपालाचारी जैसे कई प्रमुख नेता मौजूद थे।

राष्ट्रीय ध्वज के तीन रंग पहले जैसे ही रखे गए, लेकिन बीच में मौजूद चरखे की जगह अशोक चक्र को शामिल कर लिया गया। इसी बदलाव पर गांधी जी ने अपनी असहमति जताई।

चरखा हटाने से क्यों नाराज थे गांधी?

महात्मा गांधी के लिए चरखा केवल एक प्रतीक नहीं था। उनके लिए यह स्वदेशी आंदोलन, आत्मनिर्भरता और आजादी की लड़ाई का सबसे बड़ा प्रतीक था। गांधी जी का मानना था कि चरखे ने लाखों भारतीयों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का संदेश दिया।

उनका कहना था कि जिस प्रतीक ने आजादी के संघर्ष में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसे राष्ट्रीय ध्वज से हटाना उचित नहीं था।

गांधी ने क्या कहा था?

6 अगस्त 1947 को लाहौर में एक सभा को संबोधित करते हुए गांधी जी ने कहा था,

“यदि भारत के राष्ट्रीय ध्वज में चरखा नहीं होगा, तो मैं उस ध्वज को सलाम नहीं करूंगा। मैं चरखे के बिना भारत के राष्ट्रीय ध्वज की कल्पना नहीं कर सकता।”

यह बयान अक्सर अधूरा प्रस्तुत किया जाता है, जिससे यह भ्रम पैदा होता है कि गांधी जी तिरंगे का विरोध कर रहे थे। जबकि वास्तविकता यह है कि उनकी आपत्ति केवल चरखे की जगह अशोक चक्र लगाए जाने को लेकर थी।

यूनियन जैक को लेकर भी गांधी की अलग राय थी

राष्ट्रीय ध्वज को लेकर एक और विवाद उस समय सामने आया था। भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने सुझाव दिया था कि भारतीय ध्वज के एक कोने में ब्रिटेन का यूनियन जैक भी रखा जाए।

हैरानी की बात यह है कि गांधी जी ने इस सुझाव को पूरी तरह खारिज नहीं किया। उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन ने भारत पर अत्याचार जरूर किए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रिटेन के राष्ट्रीय ध्वज से घृणा की जाए।

गांधी जी ने अपने पत्र में लिखा था कि अंग्रेज स्वेच्छा से भारत को सत्ता सौंप रहे हैं और हमें उनके प्रति उदारता का भाव भी रखना चाहिए। हालांकि कांग्रेस के अधिकांश नेता इस विचार से सहमत नहीं थे और अंततः इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया।

नेहरू ने गांधी को समझाने की कोशिश की

जवाहरलाल नेहरू ने गांधी जी को समझाया कि अशोक चक्र भी प्रगति, न्याय और निरंतर आगे बढ़ने का प्रतीक है। उन्होंने यह भी कहा कि अशोक चक्र में चरखे की भावना भी दिखाई देती है।

लेकिन गांधी जी इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुए। उनका मानना था कि चरखा और अशोक चक्र दोनों अलग-अलग प्रतीक हैं और चरखे का स्थान कोई दूसरा चिन्ह नहीं ले सकता।

आखिरकार क्या हुआ?

गांधी जी की आपत्तियों के बावजूद संविधान सभा ने अशोक चक्र वाले तिरंगे को भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज घोषित किया। गांधी जी ने अपनी असहमति जरूर व्यक्त की, लेकिन लोकतांत्रिक निर्णय का सम्मान किया।

आज भारत का तिरंगा देश की एकता, स्वतंत्रता और संविधान का प्रतीक है। वहीं गांधी जी की आपत्तियां इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो यह बताती हैं कि राष्ट्रीय ध्वज के अंतिम स्वरूप तक पहुंचने की प्रक्रिया भी विचार-विमर्श और मतभेदों से होकर गुजरी थी।

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