लुटियंस का चक्रव्यूह और ‘भगवा आतंक’ का सच: पूर्व MHA अधिकारी RVS Mani के वो खुलासे जिसने हिला दी थी देश की सियासत

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सोचिए, आप देश के गृह मंत्रालय (MHA) में एक बेहद संवेदनशील और बड़े पद पर तैनात हैं। आपका काम देश की आंतरिक सुरक्षा की रिपोर्ट तैयार करना और उस पर अमल करना है। लेकिन अचानक आपको अहसास होता है कि आपकी ही सरकार देश की सुरक्षा को दांव पर लगाकर एक ऐसा ‘झूठा नैरेटिव’ गढ़ने में जुटी है, जिससे बहुसंख्यक आबादी को बदनाम किया जा सके। बात सिर्फ इतनी ही नहीं होती, जांच एजेंसियों को साफ़ निर्देश मिलते हैं कि – “आतंकियों को छोड़ो, पहले अपने ही देश के एक चुने हुए मुख्यमंत्री को फंसाओ!”

यह किसी बॉलीवुड की सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म की पटकथा नहीं है, बल्कि देश की राजनीति का वह कड़वा सच है जिसे सालों तक लुटियंस दिल्ली के गलियारों में दबाने की कोशिश की गई। इसी सच को बेनकाब करने वाले पूर्व गृह मंत्रालय अधिकारी RVS Mani को जब मोदी सरकार ने ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से नवाज़ा, तो कई सियासी हलकों में खलबली मचना लाज़मी था।

आइए, आरवीएस मणि की किताबों और दावों के जरिए इस पूरे चक्रव्यूह की परतें खोलते हैं।

1. तथाकथित ‘भगवा आतंकवाद’: एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश?

RVS Mani ने अपनी चर्चित किताब “The Myth of Hindu Terror: Insider Account of Ministry of Home Affairs 2006 to 2010” में इस बात का विस्तार से ज़िक्र किया है कि कैसे तत्कालीन यूपीए (UPA) सरकार ने अपनी सरकारी मशीनरी का कथित तौर पर दुरुपयोग किया।

हलफनामे पर हस्ताक्षर का दबाव –  मणि का दावा है कि साल 2009 में गृह मंत्रालय के राजनीतिक नेतृत्व ने उन पर ‘भगवा आतंक’ की कहानी को सही ठहराने वाले एक दूसरे हलफनामे पर हस्ताक्षर करने के लिए भारी दबाव बनाया था। उनका आरोप है कि हिंदुओं को आतंकवादी सिद्ध करने के लिए यह पूरी पटकथा लिखी गई थी।

2006 की वो सीक्रेट मीटिंग –  किताब के अनुसार, साल 2006 में आरएसएस (RSS) के नागपुर मुख्यालय में हुए बम विस्फोट के बाद एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी। इस बैठक में तत्कालीन पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और गृह मंत्री शिवराज पाटिल मौजूद थे, जिसमें मणि को भी बुलाया गया। मणि का दावा है कि जब उन्होंने एक खास मजहबी समूह के आतंकी मॉड्यूल की जानकारी दी, तब उस पर ध्यान न देकर मीटिंग में ‘नांदेड़’ और ‘बजरंग दल’ जैसे शब्दों का बार-बार इस्तेमाल किया गया। यहीं से पहली बार ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द को हवा दी गई।

2. मालेगांव ब्लास्ट और जांच का दोहरा मापदंड

किताब में मक्का मस्जिद और मालेगांव धमाकों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। मणि का आरोप है कि नैरेटिव को पूरी तरह बदलने के लिए असली गुनहगारों को ढाल दी गई और निर्दोषों को फंसाया गया।

जांच एजेंसियों की रफ्तार पर सवाल:  जब मुंबई में बड़ा आतंकी हमला हुआ, तो एटीएस (ATS) को गिरफ्तारियां करने में लगभग 5 महीने का समय लगा। लेकिन मालेगांव मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को महज 35 दिनों के भीतर गिरफ्तार कर लिया गया। जो एजेंसी एक कर्नल को 35 दिन में दबोच सकती है, उसे मुंबई ब्लास्ट के गुनहगारों तक पहुंचने में 5 महीने क्यों लगे? क्या यह त्वरित कार्रवाई सिर्फ एक खास नैरेटिव को स्थापित करने के लिए थी?

3. इशरत जहां केस: मुख्यमंत्री और गृह मंत्री को जेल भेजने का ‘ब्लूप्रिंट’

आरवीएस मणि का दूसरा सबसे बड़ा और चौंकाने वाला दावा इशरत जहां एनकाउंटर मामले से जुड़ा है। उनका कहना है कि उस वक्त गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को जेल की सलाखों के पीछे भेजने का एक ‘प्रूफ-प्रूफ प्लान’ तैयार किया गया था।

बदले गए हलफनामे: मणि के मुताबिक, उन्होंने जो पहला हलफनामा साइन किया था, उसमें खुफिया एजेंसियों (Intelligence Bureau) की इनपुट के आधार पर साफ लिखा था कि इशरत जहां का संबंध प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से था। लेकिन बाद में राजनीतिक दबाव के चलते एक दूसरा हलफनामा तैयार करवाया गया, जिसमें से लश्कर मॉड्यूल और गुजरात पुलिस की कार्रवाई से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को गायब कर दिया गया।

क्रॉस-फायर न कि फर्जी एनकाउंटर: अपनी किताबों “Deception: A Family That Deceived the Whole Nation” और ‘भगवा आतंक एक षड्यंत्र’ में मणि ने साफ किया कि वह कोई फर्जी एनकाउंटर नहीं, बल्कि क्रॉस-फायर था, जिसमें पहली गोली आतंकियों की तरफ से चली थी। गाड़ी में सवार लोग लश्कर के प्रशिक्षित लड़ाके थे। इस बात की पुष्टि बाद में मुंबई हमले के मास्टरमाइंड डेविड कोलमैन हेडली ने अमेरिकी अदालत में गवाही देते हुए भी की, जहां उसने माना कि इशरत जहां लश्कर की सुसाइड बॉम्बर थी।

4. ‘काली दाढ़ी’ और ‘सफेद दाढ़ी’ को फंसाने का निर्देश

आरवीएस मणि ने अपनी किताब में एक बेहद खतरनाक प्रशासनिक निर्देश का पर्दाफाश किया है। उनके दावों के अनुसार, उस समय के सीबीआई (CBI) डायरेक्टर ने अधिकारियों को एक स्पष्ट लेकिन मौखिक निर्देश दे रखा था:

“चाहे कुछ भी हो जाए, ‘काली दाढ़ी’ और ‘सफेद दाढ़ी’ को जेल भेजना ही भेजना है!”

राजनीति की थोड़ी सी भी समझ रखने वाला व्यक्ति आसानी से समझ सकता है कि उस दौर में गुजरात की राजनीति में ‘काली दाढ़ी’ और ‘सफेद दाढ़ी’ का इशारा किसकी तरफ था – ये सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी और अमित शाह को निशाना बनाने की कवायद थी।

निष्कर्ष: नियति का चक्र और राजनीतिक कुंठा

आज के दौर में जब कांग्रेस और विपक्षी दल वर्तमान सरकार पर जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हैं, तो इतिहास के ये पन्ने एक अलग ही कहानी बयां करते हैं। नियति का खेल देखिए, जिस नेतृत्व को कभी सरकारी मशीनरी के दम पर राजनीति से पूरी तरह बेदखल करने की साजिश रची गई थी, आज उनमें से एक व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री है और दूसरा गृह मंत्री।

यह पूरी इनसाइड स्टोरी यह समझने के लिए काफी है कि अतीत में क्यों तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ जैसे कड़े शब्द कहे गए या क्यों विपक्षी नेताओं द्वारा उन पर तीखे व्यक्तिगत हमले किए गए। आरवीएस मणि के ये खुलासे साबित करते हैं कि जब राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों को राजनीतिक कुंठा और तुष्टिकरण की वेदी पर चढ़ाया जाता है, तो देश का कितना बड़ा नुकसान होता है।

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