इंदिरा गांधी के दौर में साधु के साथ क्या हुआ था? जबरन नसबंदी का दावा और 50 साल पुरानी कहानी

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भारत के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 1975-77 के आपातकाल (इमरजेंसी) और उस दौरान चलाए गए परिवार नियोजन अभियान को लेकर आज भी बहस होती है। इसी दौर से जुड़ी एक कहानी फिर चर्चा में है, जिसमें एक साधु ने दावा किया है कि उन्हें जबरन नसबंदी अभियान का शिकार बनाया गया था। यह दावा एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में प्रकाशित उनके साक्षात्कार के आधार पर सामने आया है।

इमरजेंसी और नसबंदी अभियान

इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर परिवार नियोजन अभियान चलाया गया। इस अभियान का नेतृत्व तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी से जोड़ा जाता है। इतिहासकारों और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, इस दौरान बड़ी संख्या में नसबंदी ऑपरेशन किए गए और कई मामलों में लोगों ने जबरन नसबंदी कराए जाने के आरोप भी लगाए।

कौन हैं तपेश्वर यादव?

रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब के मोहाली में रहने वाले 71 वर्षीय चेतन दास, जिन्हें तपेश्वर यादव के नाम से भी जाना जाता है, मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के निवासी हैं। वे कबीर पंथ से जुड़े साधु हैं और कबीर के ग्रंथों का अध्ययन करते हैं।

उनके पेट पर मौजूद बड़े सर्जिकल निशानों को देखकर उनसे इसके बारे में पूछा गया। इसके जवाब में उन्होंने एक ऐसी घटना का जिक्र किया, जिसे वे आज भी नहीं भूल पाए हैं।

क्या है साधु का दावा?

तपेश्वर यादव का दावा है कि 1970 के दशक में जब नसबंदी अभियान चल रहा था, तब वे बनारस से कुशीनगर की ओर पैदल यात्रा कर रहे थे। उनके अनुसार, इसी दौरान कुछ लोग उन्हें जबरन एक जीप में बैठाकर अस्पताल ले गए, जहां उनकी इच्छा के बिना नसबंदी कर दी गई।

उन्होंने यह भी दावा किया कि ऑपरेशन के दौरान गंभीर चिकित्सकीय लापरवाही हुई और सर्जरी में इस्तेमाल की गई एक कैंची उनके शरीर के अंदर ही रह गई। बाद में इस गलती का पता चलने पर डॉक्टरों को दोबारा ऑपरेशन करना पड़ा। उनका कहना है कि इसी वजह से आज भी उनके पेट पर बड़े सर्जिकल निशान मौजूद हैं। इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

उस दौर को लेकर क्या कहते हैं तपेश्वर यादव?

तपेश्वर यादव का कहना है कि उन्होंने नसबंदी अभियान शुरू होने से पहले ही सांसारिक जीवन छोड़कर संन्यास अपना लिया था। इसके बावजूद उन्हें इस अभियान का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार, उस समय अभियान के दौरान गृहस्थ और संन्यासी जैसे भेद नहीं किए जाते थे और बड़ी संख्या में पुरुषों को इसके दायरे में लाया जा रहा था।

तपेश्वर यादव का वर्तमान जीवन

रिपोर्ट के मुताबिक, तपेश्वर यादव चार भाई-बहनों वाले परिवार से आते हैं। उनके पिता का वर्ष 1992 में निधन हो गया था, जबकि उनकी माता जीवित हैं। वे समय-समय पर गोरखपुर जाते हैं, लेकिन अधिकतर समय देशभर में भ्रमण करते हैं। वर्तमान में उनका निवास मोहाली में एक श्मशान घाट के पास स्थित कबीर चौरा में है। वे कबीर के ‘बीजक’ और ‘अनुराग सागर’ जैसे ग्रंथों का अध्ययन और प्रचार-प्रसार करते हैं।

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